अल्मियागांव/थल। पिथौरागढ़ जिले के थल क्षेत्र में वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं ग्रामीणों की चिंता बढ़ा रही हैं। कभी बंदरों के हमले में लोग घायल हो रहे हैं, तो कभी जंगली जानवरों के हमले से ग्रामीणों की जान पर बन आ रही है। ताजा मामला अल्मियागांव का है, जहां मंगलवार सुबह बकरियां चराने जंगल गए राजेंद्र प्रसाद पर एक आक्रामक जंगली सूअर ने हमला कर उन्हें घायल कर दिया। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं के बीच वन्यजीवों से सुरक्षा और पीड़ितों को राहत देने की व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार, राजेंद्र प्रसाद मंगलवार सुबह करीब 10 बजे अपनी बकरियों को लेकर घर से लगभग दो किलोमीटर दूर जंगल में चराने गए थे। इसी दौरान झाड़ियों में छिपे जंगली सूअर ने अचानक उन पर हमला कर दिया और उनकी दाईं बांह में दांत गड़ा दिए, जिससे वह लहूलुहान हो गए।

हमले के बाद सूअर ने दोबारा पलटकर वार करने की कोशिश की। ऐसे में राजेंद्र प्रसाद ने हिम्मत दिखाते हुए लाठी घुमाकर उसका मुकाबला किया, जिसके बाद सूअर वहां से भाग गया। घटना के बाद परिजन उन्हें उपचार के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गोचर ले गए। वहां प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने उन्हें बेहतर इलाज के लिए जिला मुख्यालय रेफर कर दिया।

दिनदहाड़े हुए इस हमले से अल्मियागांव सहित आसपास के गांवों में भय का माहौल है। जंगल में मवेशी चराने जाने वाले ग्रामीणों को अब अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी है।

थल में बंदरों के हमलों से 10–12 लोग घायल होने की सूचना थल क्षेत्र में वन्यजीवों के हमलों की समस्या नई नहीं है। इससे पहले भी ऐसी घटनाओं से जुड़ी खबरें लगातार सामने आती रही हैं। हमारे संवाददाता के अनुसार, थल क्षेत्र में बंदरों के काटने से लगभग 10 से 12 लोग घायल हो चुके हैं। इन घटनाओं ने क्षेत्र में वन्यजीवों के बढ़ते खतरे और आम लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।

ग्रामीणों का सवाल है कि जब वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, तो इन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? क्या वन विभाग की गश्त और निगरानी पर्याप्त है? जंगल और आबादी के आसपास रहने वाले लोगों को सुरक्षित रखने के लिए क्या कोई प्रभावी कार्ययोजना बनाई गई है?

वन्यजीव संघर्ष के मामलों में मुआवजे को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, गंभीर रूप से घायल होकर जिला अस्पताल में भर्ती रहे कुछ लोगों को मुआवजा मिल चुका है। वहीं, जिन लोगों के हाथ-पैर में चोटें आईं और जिन्हें रेबीज का टीका लगवाने के लिए जिला अस्पताल जाना पड़ा, उन्हें अब तक आर्थिक सहायता नहीं मिलने की बात सामने आ रही है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहत पाने के लिए अस्पताल में भर्ती होना जरूरी है? बंदरों के काटने या अन्य वन्यजीवों के हमले में घायल होने वाले उन लोगों की सहायता के लिए क्या व्यवस्था है, जिन्हें अस्पताल में भर्ती तो नहीं होना पड़ा, लेकिन उपचार और टीकाकरण के लिए बार-बार अस्पताल जाना पड़ा?

हालांकि, मुआवजे की पात्रता संबंधित नियमों और चोट की श्रेणी पर निर्भर करती है। ऐसे में वन विभाग और प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि किन परिस्थितियों में सहायता दी जाती है और प्रभावित लोगों के लंबित मामलों का निस्तारण कैसे होगा।

थल क्षेत्र में लगातार हो रहे वन्यजीव हमलों को रोकने के लिए वन विभाग ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं ? बंदरों के हमलों से परेशान ग्रामीणों को राहत देने और समस्या के स्थायी समाधान के लिए क्या योजना है ? गंभीर रूप से घायल लोगों को मुआवजा मिलने के बावजूद अन्य पीड़ितों को सहायता नहीं मिलने के क्या कारण हैं ?

क्या बंदरों के काटने से घायल हुए लोगों के मामलों की जांच कर उनकी पात्रता के अनुसार सहायता उपलब्ध कराई जाएगी ? क्या प्रशासन क्षेत्र में वन्यजीव हमलों से प्रभावित लोगों का सर्वे कराकर उनकी समस्याओं का समयबद्ध समाधान करेगा?

वन्यजीव संरक्षण पर्यावरण और जैव विविधता के लिए आवश्यक है, लेकिन इसके साथ आम नागरिकों की सुरक्षा और हमलों के पीड़ितों को नियमानुसार समय पर सहायता उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। थल क्षेत्र में सामने आ रही घटनाएं इस बात की ओर संकेत करती हैं कि सुरक्षा, निगरानी और राहत व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत है।

अब देखना यह है कि अल्मियागांव में जंगली सूअर के हमले और थल क्षेत्र में बंदरों के काटने की घटनाओं पर शासन-प्रशासन कब संज्ञान लेता है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि संबंधित विभाग केवल घटनाओं के बाद कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम और पीड़ितों को राहत दिलाने के लिए भी ठोस पहल करेंगे।