साहित्य
साहित्यजिधर देखो उधर नशा ही नशा
बेरोज़गारी, महंगाई, स्वार्थ, दिखावे और अंधविश्वास से लेकर समाजसेवा तक—जीवन में छाए अलग-अलग ‘नशों’ पर डॉ. तारा सिंह की सार्थक कविता
साहित्यज़ख्मों से कराहता हिमालय, अब भी नहीं जाग रहे हम
बांधों, सुरंगों, सड़कों, अवैध खनन, जंगलों की आग और पेड़ों के कटान से बढ़ रहा हिमालय पर संकट; डॉ. तारा सिंह ने कहा—“नेपाल से सीख लेकर एकजुट हों, हिमालय बचाएं”
साहित्यहिमालय के नाम अंतिम पत्र ।
जंगल की आग में सिर्फ पेड़ नहीं जलते—घोंसले, मधुमक्खियां, दुर्लभ जड़ी-बूटियां, मिट्टी के सूक्ष्म जीव और जलस्रोतों का भविष्य भी प्रभावित होता है; प्रकृति की हर क्षति को रुपयों में नहीं आंका जा सकता।
साहित्यफूल, खुशबू और कविता का अनोखा संसार
विक्रम नेगी 'बूंद' की कविता में बाज़ार, संवेदना और जीवन के रस का गहन रूपक
साहित्यचीज़ें कुछ नहीं बोलतीं, बोलते हैं शब्द
एक संवेदनशील कविता, जो बताती है कि वस्तुएँ मौन होती हैं, लेकिन उनके अर्थ, भावनाएँ और इतिहास शब्दों के माध्यम से जीवित होते हैं।
साहित्यशतरंज के मोहरे
युद्ध, राष्ट्रवाद और शतरंज की बिसात पर बिछी ज़िंदगियों की कहानी।
साहित्यद्रोपदी की लाज
जब-जब समाज मौन हुआ, दुशासन और मजबूत हुआ।
साहित्यतन्हाई की गहराई में डूब जाने वाली ग़ज़ल गोविंद भट्ट 'मुसाफिर' की अनमोल रचना
रिश्तों में घटते विश्वास और बढ़ती दूरियों का मार्मिक चित्रण।
