पिथौरागढ़। जातीय भेदभाव और सामाजिक विभाजन की चर्चाओं के बीच सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के कनालीछीना विकासखंड का बस्तड़ी गांव सामाजिक सौहार्द और लोक परंपरा की एक अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। यहां बान देवता की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी अनुसूचित जाति समाज के चंद्र प्रकाश का परिवार पिछले लगभग पांच पीढ़ियों से निभाता आ रहा है। खास बात यह है कि मंदिर में सवर्ण समाज के लोग भी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा स्थानीय लोक आस्था, आपसी विश्वास और सामाजिक सहभागिता की कहानी बयां करती है।
पूर्वजों से मिली पूजा की जिम्मेदारी, आज भी निभा रहे परंपरा चंद्र प्रकाश के अनुसार, उनके परिवार का बान देवता की सेवा और पूजा-अर्चना से पीढ़ियों पुराना जुड़ाव रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बान देवता को छुरमल देवता और कलशीन देवता के अगवानी वीर के रूप में पूजा जाता है। इस परंपरा की सबसे विशिष्ट बात यह है कि बान देवता के पुजारी का दायित्व लंबे समय से अनुसूचित जाति समाज के इसी परिवार के पास रहा है ।
चंद्र प्रकाश बताते हैं कि उन्होंने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में इंस्पेक्टर के पद पर लंबे समय तक सेवाएं दीं और सेवानिवृत्त होने के बाद पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली। पिता के निधन के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को जारी रखने का दायित्व उनके हिस्से आया। उनके मुताबिक, छोटे भाई पर देवता का अवतरण होने के बाद परिवार में पूजा की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई।
चंद्र प्रकाश के लिए बान देवता की सेवा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली आस्था, जिम्मेदारी और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। उनका मानना है कि पारंपरिक समाज की स्थानीय व्यवस्थाओं और धार्मिक परंपराओं में विभिन्न समुदायों की भूमिकाएं एक-दूसरे से जुड़ी रही हैं। समय के साथ सामाजिक व्यवस्थाओं के राजनीतिकरण ने लोगों के बीच दूरियां बढ़ाई हैं, जबकि स्थानीय परंपराएं आपसी जुड़ाव और विश्वास को समझने का अवसर देती हैं।
बस्तड़ी गांव की यह परंपरा बताती है कि लोक संस्कृति में धार्मिक जिम्मेदारियां हमेशा एक ही सामाजिक दायरे तक सीमित नहीं रही हैं। यहां एक अनुसूचित जाति परिवार पीढ़ियों से पुजारी की भूमिका निभा रहा है और दूसरे समुदायों के लोग भी उसी देवस्थल पर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं। यह परंपरा सामाजिक संबंधों के ऐसे स्वरूप को सामने लाती है, जिसमें आस्था और परंपरा लोगों को जोड़ने का माध्यम बनती हैं।
वर्तमान दौर में सोशल मीडिया पर जाति, धर्म और सामाजिक व्यवस्था को लेकर कई बार अधूरी या भ्रामक जानकारियां प्रसारित होती हैं। ऐसे में स्थानीय लोक देवताओं, पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थाओं और उनसे जुड़े परिवारों की कहानियों को सामने लाना महत्वपूर्ण है। बान देवता की पूजा से जुड़ी यह परंपरा सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक विविधता पर संवाद का अवसर देती है।
बस्तड़ी गांव का यह उदाहरण स्थानीय इतिहास और लोक मान्यताओं को समझने की जरूरत जरूर रेखांकित करता है। चंद्र प्रकाश के परिवार की पांच पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा इस बात की याद दिलाती है कि सांस्कृतिक विरासत किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं होती।
आज जरूरत ऐसी परंपराओं से प्रेरणा लेकर जातिगत भेदभाव के बजाय समानता, आपसी सम्मान और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की है। बस्तड़ी गांव की बान देवता से जुड़ी यह विरासत इसी संदेश को आगे बढ़ाती है । _समीक्षा भट्ट की रिपोर्ट


