पिथौरागढ़।

आज रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और रक्षा के संकल्प से जुड़ा है। बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। लेकिन पहाड़ के कई गांवों में कुछ दशक पहले इस पर्व का स्वरूप आज से काफी अलग था। कई ग्रामीण क्षेत्रों में सावन पूर्णिमा को मुख्य रूप से ‘जनेऊ पूर्णिमा’ या ‘जनेऊ पून्यू’ के रूप में मनाने की परंपरा थी।

पिथौरागढ़ के 84 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक बीडी भट्ट पुरानी परंपराओं को याद करते हुए बताते हैं कि उनके समय में सावन पूर्णिमा के दिन गांव के लोग नदी या गाड़-गधेरों के किनारे एकत्र होते थे। वहां धार्मिक विधि-विधान के साथ तर्पण किया जाता था और इसके बाद जनेऊ बदला जाता था।

भट्ट के अनुसार, उस दौर में कुल पुरोहित ही लोगों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते थे। यह रक्षा सूत्र आज की तरह भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं था, बल्कि धार्मिक आस्था और मंगलकामना से जुड़ा हुआ था।

भाई-बहन के पर्व के रूप में धीरे-धीरे बढ़ा चलन समय के साथ सामाजिक जीवन और पर्व मनाने की परंपराओं में भी बदलाव आया। रक्षासूत्र बांधने की धार्मिक परंपरा के साथ भाई-बहन के स्नेह और रिश्ते को केंद्र में रखकर रक्षाबंधन मनाने का चलन भी पहाड़ के गांवों में धीरे-धीरे बढ़ता गया।

आज ज्यादातर जगहों पर सावन पूर्णिमा का पर्व रक्षाबंधन के रूप में अधिक पहचान रखता है, हालांकि जनेऊ बदलने, तर्पण और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा भी कई क्षेत्रों में अब तक कायम है।

पौराणिक कथाओं में भी रक्षासूत्र का विशेष महत्व रक्षाबंधन से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में कई पौराणिक प्रसंग मिलते हैं। इंद्र और शची, भगवान कृष्ण और द्रौपदी, माता लक्ष्मी और राजा बलि तथा यमराज और यमुना से जुड़ी कथाओं में रक्षा सूत्र को स्नेह, आस्था और संरक्षण के प्रतीक के रूप में देखा गया है।

हालांकि इन कथाओं के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि आज की तरह भाई-बहन द्वारा राखी बांधने की परंपरा हर क्षेत्र में प्राचीन काल से समान रूप से चली आ रही थी। अलग-अलग क्षेत्रों में सावन पूर्णिमा से जुड़ी स्थानीय परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं अलग रही हैं।

बदलाव के बीच बची हुई पुरानी यादें पहाड़ में रक्षाबंधन का बदलता स्वरूप केवल एक त्योहार के बदलने की कहानी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक जीवन की तस्वीर भी है। कभी जहां सावन पूर्णिमा पर नदी किनारे तर्पण, जनेऊ परिवर्तन और पुरोहितों द्वारा रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा प्रमुख थी, वहीं आज भाई-बहन के रिश्ते ने इस पर्व को एक नया सामाजिक और भावनात्मक स्वरूप दे दिया है।

बीडी भट्ट जैसे बुजुर्गों की यादें इस बदलाव की मौखिक विरासत को संजोए हुए हैं। इनके जरिए नई पीढ़ी यह समझ सकती है कि पर्व वही रहा, लेकिन उसे मनाने का तरीका समय के साथ बदलता गया। __ कपिल भट्ट वाणी न्यूज