पिथौरागढ़। रामलीला मैदान में आयोजित सातूं-आठूं महोत्सव के तहत चल रही स्कूली बच्चों की झोड़ा-चांचरी प्रतियोगिता का मंगलवार को निर्णायक दिन रहा। प्रतियोगिता में विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने कुमाऊं की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपरा और लोकगीत-संगीत की शानदार प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

प्रतियोगिता में डॉन बॉस्को स्कूल पिथौरागढ़ ने प्रथम स्थान हासिल किया। मानस एकेडमी ने द्वितीय, वीरशिवा स्कूल ने तृतीय तथा महर्षि विद्या मंदिर ने चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। खास बात यह रही कि वर्ष 2024 की प्रतियोगिता में भी डॉन बॉस्को स्कूल ने प्रथम स्थान हासिल किया था। इस तरह विद्यालय ने लगातार दूसरी बार यह उपलब्धि अपने नाम की।

प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में वरिष्ठ रंगकर्मी हेमराज सिंह बिष्ट, सदानंद भट्ट, लोकगायक सुरेश सुरेला एवं राजेंद्र तिवारी शामिल रहे। निर्णायकों ने प्रस्तुतियों में लोक परंपरा, वेशभूषा, ताल, लय, गायन, नृत्य और मंचीय अनुशासन के विभिन्न पक्षों के आधार पर प्रतिभागियों का मूल्यांकन किया।

डॉन बॉस्को स्कूल के छात्र-छात्राओं ने संगीत शिक्षक नीरज तिवारी के निर्देशन तथा गीता जोशी और ममता पाल के नृत्य निर्देशन में अपनी प्रस्तुति की शुरुआत ‘लाओ चेलियो धतूरी को फूला’ जैसे पारंपरिक लोकगीत से की। इसके बाद आठूं के बिरुड़ा पूजन सहित आठूं के विभिन्न लोकगीतों और चांचरी की शानदार प्रस्तुति ने माहौल को पूरी तरह लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया।

विद्यालय के मैनेजर फादर संजीव एवं सिस्टर अनिथा मेन्डोसा ने प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन और प्रथम स्थान प्राप्त करने पर सभी छात्र-छात्राओं, शिक्षकों एवं प्रशिक्षकों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि बच्चों की ऐसी प्रस्तुतियां हमारी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

प्रतिभागी बच्चों को स्मृति-चिह्न देकर किया सम्मानित सातूं-आठूं महोत्सव के दौरान पहले दिन से प्रतियोगिता में प्रतिभाग करने वाले सभी बच्चों को भी सम्मानित किया गया। वीरेंद्र शाह ठुलघरिया ने अपने पिता स्वर्गीय राजेंद्र शाह ठुलघरिया की स्मृति में सभी प्रतिभागी बच्चों को स्मृति-चिह्न प्रदान किए। इस पहल ने महोत्सव में प्रतिभाग करने वाले बच्चों का उत्साह और बढ़ाया।

सातूं-आठूं महोत्सव की यह प्रतियोगिता केवल एक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि कुमाऊं की लोक संस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक मान्यताओं को नई पीढ़ी से जोड़ने का जीवंत मंच बनी। बच्चों की प्रस्तुतियों ने यह संदेश भी दिया कि आधुनिक दौर में भी पहाड़ की सांस्कृतिक जड़ें आज की पीढ़ी के बीच मजबूती से जीवित हैं।

रिपोर्ट — कपिल भट्ट, वाणी न्यूज़