हल्द्वानी : राजनीतिक झंडे, सत्ता का रसूख और गाड़ियों के शीशों पर टंगे पद-नाम—आज की भारतीय सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का वह यथार्थ हैं, जो जॉर्ज ऑरवेल के 'एनिमल फार्म' की याद बरबस ताज़ा कर देता है। वह ठीक उसी मानसिकता का आधुनिक रूप है जिसे ऑरवेल ने अपने कालजयी उपन्यास के अंत में उकेरा था।ऐतिहासिक संदर्भ: क्रांति से नए विशेषाधिकार तक'एनिमल फार्म' में जब जानवरों ने मिस्टर जोन्स के खिलाफ विद्रोह किया था, तब उनका सपना एक ऐसा समाज बनाने का था जहाँ कोई छोटा या बड़ा न हो। दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा गया था—“सभी जानवर समान हैं।”लेकिन सत्ता बदलते ही चाल-ढाल बदल गई। जिन सूअरों (नेपोलियन और उसके साथियों) ने क्रांति की अगवाई की थी, वे धीरे-धीरे इंसानों के बने-बनाये आलीशान कमरों में रहने लगे, शराब पीने लगे और कोड़े हाथ में थाम लिए। जब साधारण जानवरों को यह लगा कि उनके साथ छल हुआ है, तब तक दीवार का नियम बदला जा चुका था:“सभी जानवर समान हैं, लेकिन कुछ जानवर दूसरों से अधिक समान हैं।”ऑरवेल ने यह पंक्ति स्टालिनवादी व्यवस्था के पाखंड पर लिखी थी, जहाँ समानता का नारा केवल जनता को भ्रम में रखने के लिए था, जबकि शासक वर्ग खुद को सारे नियमों और कानूनों से ऊपर रख चुका था।आज का दौर: लोकतंत्र और विशेषाधिकार की संस्कृतिआज के दौर में जब हम सड़कों पर गाड़ियों पर लगे राजनीतिक दलों के प्रतीक चिन्ह, रसूखदारों के आगे झुकता प्रशासनिक तंत्र और कानून के दोहरे मापदंड देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि 'नेपोलियन' और उसकी व्यवस्था ख़त्म नहीं हुई, बल्कि उसने नया रूप ले लिया है।सत्ता का प्रतीक और कानून की लाचारी: साधारण नागरिक अगर एक छोटी सी भूल कर दे, तो उस पर नियमों का पूरा बोझ डाल दिया जाता है। इसके विपरीत, गाड़ियों के शीशों और नंबर प्लेटों पर सत्ता का 'चिन्ह' या 'झंडा' लगाकर चलने वाले लोगों के लिए कानून का हर पहरा अपने-आप हट जाता है।'अधिक समान' वर्ग का उदय: लोकतंत्र की मूल अवधारणा यह थी कि जनप्रतिनिधि जनता का 'सेवक' होगा और कानून के सामने सब बराबर होंगे। लेकिन व्यवहार में, एक ऐसा नया 'आभिजात्य वर्ग' (VIP Culture) तैयार हो गया है, जिसके लिए व्यवस्था सारे नियम शिथिल कर देती है।अधिकारों की असमानता: एक आम नागरिक दिन-रात पसीना बहाकर भी जीवन के बुनियादी संसाधनों के लिए संघर्ष करता है, जबकि राजनीतिक संरक्षण प्राप्त छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं के पास भी कुछ ही समय में आय के ज्ञात स्रोतों से परे की सुख-सुविधाएं आ जाती हैं।ऑरवेल के उपन्यास का अंतिम दृश्य सबसे दुखद और मारक है—जहाँ साधारण जानवर खिड़की से अंदर झांकते हैं और पाते हैं कि सूअरों और इंसानों में अब कोई फर्क नहीं रह गया है।आज भी जब जनता यह तय नहीं कर पाती कि आम नागरिक और विशेषाधिकार प्राप्त 'विशिष्ट वर्ग' के बीच कानून का पालन कराने में व्यवस्था इतना भेद क्यों करती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि 'एनिमल फार्म' केवल एक कहानी नहीं थी, बल्कि हर उस व्यवस्था का सटीक चित्रण था जहाँ लोकतंत्र के आवरण में विशेषाधिकार की संस्कृति फलती-फूलती है। _ गोविंद यह लेख लेखक के निजी विचारों और दृष्टिकोण पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और आवश्यक नहीं कि वे VANI NEWS की संपादकीय नीति या विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों। vani news
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सत्ता बदली, सियासत नहीं: ‘एनिमल फार्म’ का सच आज भी जिंदा
राजनीतिक झंडों, वीआईपी संस्कृति और दोहरे कानून के बीच ‘एनिमल फार्म’ का आईना—क्या लोकतंत्र में भी पनप रहा है विशेषाधिकार का नया वर्ग ?
Vani Admin2 मिनट पहले3 मिनट पढ़ें

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लेखक के बारे में
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गोविन्द बल्लभ पंत !! गणित के समीकरणों से प्रकृति के सामंजस्य तक। सेवानिवृत्त शिक्षक एवं पक्षी प्रेमी।
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