गंगोलीहाट/पिथौरागढ़।

गंगोलीहाट तहसील मुख्यालय से करीब आठ किलोमीटर दूर भंडारीगांव में शनिवार को गुलदार के हमले में 10 वर्षीय बालक की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। घर के आंगन में दादी के सामने खेल रहा मासूम अचानक गुलदार का शिकार बन गया। ग्रामीणों और परिजनों ने तत्काल उसकी तलाश शुरू की और कुछ देर बाद घर से करीब 200 मीटर दूर झाड़ियों में बालक का शव बरामद हुआ। घटना के बाद गांव में दहशत और आक्रोश का माहौल है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या यह हमला अचानक हुआ या पहले से मौजूद खतरे को नजरअंदाज किया गया? ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्र में लंबे समय से गुलदार की सक्रियता बनी हुई थी। स्थानीय रिपोर्ट में ग्राम प्रधान दान सिंह मेहता के हवाले से स्पष्ट लिखा है कि 25 सितंबर को जनता दरबार में जिलाधिकारी को पत्र सौंपकर क्षेत्र में गुलदार की सक्रियता की जानकारी दी गई थी और उसे पकड़ने के लिए तत्काल प्रभावी कार्रवाई की मांग की गई थी।

उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन लगातार चुनौती बनता जा रहा है। जंगल और आबादी के बीच दूरी कम होने, प्राकृतिक आवास में बदलाव, जंगलों में भोजन की उपलब्धता, आवारा पशुओं की मौजूदगी और गांवों के आसपास बढ़ती वनस्पति जैसे कई कारण वन्यजीवों को आबादी के नजदीक ला रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसका समाधान केवल किसी हमलावर गुलदार को पकड़ने तक सीमित नहीं होना चाहिए। लैंडस्केप स्तर पर लगातार निगरानी, स्थानीय समुदाय की भागीदारी, कचरा और मृत पशुओं का उचित निस्तारण, तकनीक तथा त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था को एक साथ लागू करना जरूरी है।

गंगोलीहाट की घटना इसी बड़े सवाल को सामने रखती है—क्या वन्यजीव संरक्षण की व्यवस्था के साथ ग्रामीणों की सुरक्षा को भी समान प्राथमिकता मिल रही है?

मानव–वन्यजीव संघर्ष को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने हाल के समय में कई कदम घोषित किए हैं। जनवरी 2026 में राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक में संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित पेट्रोलिंग, डिजिटल निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने के निर्देश दिए गए। प्रभावित गांवों में सोलर फेंसिंग, बायो-फेंसिंग, हनी-बी फेंसिंग और वॉच टावर जैसे उपायों पर भी जोर दिया गया है।

राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष में मानव मृत्यु के मामलों में अनुग्रह राशि छह लाख से बढ़ाकर 10 लाख रुपये की गई है। साथ ही 32 वन प्रभागों में त्वरित कार्रवाई के लिए 93 क्विक रिस्पांस टीम (QRT) गठित की गई हैं। पिथौरागढ़, चंपावत और रुद्रप्रयाग में वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने का प्रस्ताव भी आगे बढ़ाया गया है।

इसके अलावा सरकार ने सोलर फेंसिंग और सेंसर आधारित अलर्ट सिस्टम बढ़ाने, वन्यजीव रेस्क्यू एवं रिहैबिलिटेशन सेंटर विकसित करने तथा वन विभाग के रेंजर स्तर के अधिकारियों को मानव–वन्यजीव संघर्ष के मामलों में अधिक अधिकार देने के लिए नियमों में आवश्यक बदलाव की बात कही है।

गंगोलीहाट जैसी घटनाएं यह सवाल भी उठाती हैं कि नीति केवल घटना के बाद मुआवजा देने तक सीमित न रहे। जरूरत है कि संघर्ष संभावित गांवों को पहले से चिन्हित कर 'हाई रिस्क जोन' बनाया जाए।

आबादी के आसपास नियमित कैमरा ट्रैप और ड्रोन निगरानी हो। बार-बार दिखाई देने वाले गुलदारों की पहचान कर उनका व्यवहार रिकॉर्ड किया जाए।

स्कूल जाने वाले बच्चों और बुजुर्गों के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाया जाए। गांवों में शाम और सुबह के समय विशेष गश्त हो। वन विभाग, पुलिस, राजस्व विभाग और ग्राम पंचायत की संयुक्त त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था हो। जिस गांव से वन्यजीव की सक्रियता की शिकायत मिले, उस शिकायत पर समयबद्ध कार्रवाई और ऑनलाइन ट्रैकिंग की व्यवस्था हो। आबादी के आसपास झाड़ियों की सफाई, मृत पशुओं के शवों का सुरक्षित निस्तारण और खुले में कूड़ा फेंकने पर रोक लगाई जाए। जरूरत वाले गांवों में सोलर फेंसिंग, सेंसर अलार्म और प्रकाश व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए। बार-बार मानव पर हमला करने वाले वन्यजीव के मामले में वैज्ञानिक आधार पर त्वरित निर्णय लिया जाए।

वन विभाग की कार्रवाई के साथ ग्रामीणों की सतर्कता भी बेहद जरूरी है। गुलदार प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों को अकेले बाहर न भेजें, विशेषकर सुबह और शाम। घर के आसपास झाड़ियां और घना कूड़ा जमा न होने दें। पशुओं को सुरक्षित बाड़े में रखें और मृत पशुओं को खुले में न छोड़ें।

गुलदार दिखाई देने पर उसके पीछे दौड़ने या भीड़ जुटाने के बजाय तत्काल वन विभाग और पुलिस को सूचना दें। बच्चों को अकेले जंगल, खेत या सुनसान रास्तों पर भेजने से बचें।

भंडारीगांव में मासूम की मौत के बाद ग्रामीणों की सबसे बड़ी मांग गुलदार को पकड़ने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की है। यह मांग स्वाभाविक भी है। लेकिन इस घटना को केवल एक आदमखोर वन्यजीव की कहानी मानकर छोड़ देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

वन्यजीव भी उत्तराखंड की प्राकृतिक विरासत हैं और ग्रामीणों की जिंदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए जरूरत ऐसी नीति की है जिसमें वन्यजीव संरक्षण के साथ मानव जीवन की सुरक्षा को भी समान प्राथमिकता मिले।

भंडारीगांव का यह हादसा एक परिवार की अपूरणीय क्षति है, लेकिन साथ ही नीति-निर्माताओं के लिए एक चेतावनी भी—खतरे की सूचना मिलने के बाद कार्रवाई घटना के बाद नहीं, घटना से पहले होनी चाहिए।