पिथौरागढ़। संस्कृत भाषा, सनातन परंपराओं और भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं समाजसेवी डॉ. पीताम्बर अवस्थी की नवप्रकाशित पुस्तक ‘गणेश पूजन पद्धति’ का विमोचन ज्ञान प्रकाश संस्कृत पुस्तकालय, मंजरी कुंज, न्यू बजेटी में किया गया। पुस्तक का उद्देश्य गणेश पूजन की विधि को जनसामान्य तक पहुंचाना और विशेष रूप से नई पीढ़ी को धार्मिक परंपराओं एवं संस्कारों से परिचित कराना है।

पुस्तक के माध्यम से उन लोगों को भी गणेश पूजन की विधि समझने में सहायता मिलेगी, जो धार्मिक अनुष्ठान करना चाहते हैं, लेकिन पूजा की सही प्रक्रिया और मंत्रों की जानकारी के अभाव में संकोच करते हैं। सरल एवं व्यवस्थित पूजन पद्धति के जरिए लोग अपने घरों में विधिपूर्वक पूजा-अर्चना कर सकेंगे। इससे युवाओं और बच्चों में भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था तथा पारंपरिक संस्कारों के प्रति रुचि बढ़ने की उम्मीद है।

विमोचन अवसर पर युवा साहित्यकार एवं देवभूमि शिक्षा केंद्र के निदेशक डॉ. नीरज चंद्र जोशी ने डॉ. अवस्थी के व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने संस्कृत भाषा के उत्थान एवं प्रचार-प्रसार के लिए वर्ष 2003 में संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना की थी। पुस्तकालय समिति के माध्यम से वे विद्यार्थियों को संस्कृत सिखाने के लिए संस्कृत संभाषण शिविर आयोजित करते रहे हैं। इसके साथ ही संस्कृत विषय से जुड़ी विभिन्न प्रतियोगिताओं के माध्यम से छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहित और पुरस्कृत भी करते रहे हैं।

डॉ. अवस्थी इससे पूर्व जनसामान्य के लिए स्तवन और नित्य पूजा पद्धति जैसी पुस्तकों का प्रकाशन कर चुके हैं। उनकी अब तक दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी साहित्य साधना संस्कृत भाषा और सनातन परंपराओं को समाज के बीच जीवंत बनाए रखने का निरंतर प्रयास है।

धार्मिक संस्कारों से सामाजिक मूल्यों को मिलेगी मजबूती पुस्तक के प्रकाशन को केवल धार्मिक साहित्य की उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों और संस्कारों को मजबूत करने की दिशा में भी एक सार्थक प्रयास माना जा रहा है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ना महत्वपूर्ण है। पूजा-पाठ और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन के माध्यम से सेवा, अनुशासन, सद्भाव, करुणा और नैतिक आचरण जैसे मूल्यों को बढ़ावा मिल सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक गतिविधियों में सकारात्मक सहभागिता और संस्कारों की शिक्षा समाज में बढ़ती नकारात्मक प्रवृत्तियों तथा सामाजिक विकृतियों को कम करने में सहायक हो सकती है। ऐसे प्रयासों से लोगों में पारिवारिक जुड़ाव, आपसी सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी मजबूत हो सकती है।

इस अवसर पर मंजुला अवस्थी ने डॉ. अवस्थी की साहित्य साधना की सराहना करते हुए कहा कि वे संस्कृत, संस्कृति और समाज सेवा के प्रति निष्ठापूर्वक समर्पित साधक के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनका योगदान जनहित की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश वर्मा ने संस्कृत पुस्तकालय में उपलब्ध विशाल संस्कृत ग्रंथ संग्रह की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह का पुण्य कार्य विरले ही लोग करते हैं। यह पुस्तकालय आज जनपद की बौद्धिक संपदा का केंद्र बन गया है, जहां सभी के लिए निःशुल्क पुस्तकें उपलब्ध हैं।

पुस्तक विमोचन के अवसर पर वरिष्ठ कवयित्री लक्ष्मी आर्या, डॉ. आनन्दी जोशी, भावना भट्ट, जयमाला देवलाल सहित नगर के बुद्धिजीवियों, जनप्रतिनिधियों और साहित्यकारों ने डॉ. पीताम्बर अवस्थी को नई पुस्तक के प्रकाशन पर बधाई दी और उनके साहित्यिक एवं सांस्कृतिक योगदान की सराहना की।