उत्तराखंड की सड़कें: मौत को दुर्घटना कहकर कब तक बचेंगे जिम्मेदार?
उत्तराखंड के पहाड़ों में होने वाली सड़क दुर्घटना केवल किसी वाहन के खाई में गिरने की खबर नहीं होती। उसके साथ किसी परिवार का सहारा चला जाता है। किसी मां की गोद उजड़ती है। किसी बच्चे के सिर से माता-पिता का हाथ उठ जाता है और किसी गांव पर वर्षों तक न मिटने वाला शोक उतर आता है। इसके बावजूद हर बड़ी दुर्घटना के बाद सरकारी व्यवस्था का लगभग तय बयान सामने आता है। वाहन तेज गति में था। चालक ने नियंत्रण खो दिया। चालक को नींद आ गई थी या उसके नशे में होने की आशंका थी। जांच की घोषणा होती है। मुआवजे का आश्वासन दिया जाता है और कुछ दिनों बाद मामला सरकारी फाइलों में दब जाता है।
सबसे आसान काम चालक को दोषी ठहराना है। दुर्घटना में जान गंवा चुका चालक अपना पक्ष रखने के लिए जीवित नहीं होता। लेकिन क्या उत्तराखंड की हर सड़क दुर्घटना का अपराधी केवल चालक ही है? सड़क बनाने वाले विभागों की क्या कोई जिम्मेदारी नहीं है? सड़क की गुणवत्ता जांचने वाले अभियंता क्या जवाबदेह नहीं हैं? गड्ढे भरना, पैरापिट और क्रैश बैरियर लगाना, चेतावनी संकेत स्थापित करना तथा दुर्घटना वाले स्थानों को सुरक्षित बनाना किसकी जिम्मेदारी है? वर्षों से बदहाल सड़क की स्थिति जानते हुए मौन रहने वाला प्रशासन स्वयं को निर्दोष कैसे मान सकता है?
पहाड़ों में सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं है। यह जीवन की मुख्य धारा है। इसी सड़क से गर्भवती महिला अस्पताल पहुंचती है। छात्र विद्यालय जाता है। किसान अपनी उपज बाजार ले जाता है। सैनिक छुट्टी पर अपने घर लौटता है और बीमार बुजुर्ग उपचार की उम्मीद लेकर शहर की ओर निकलता है। ऐसी जीवनरेखा पर एक छोटा गड्ढा भी सामान्य दोष नहीं होता। संकरे मोड़, तीखी ढलान, कमजोर पुस्ते और गहरी खाई के बीच वही गड्ढा वाहन का संतुलन बिगाड़कर कई जिंदगियां समाप्त कर सकता है।
पहाड़ी सड़क पर छोटी प्रशासनिक लापरवाही भी मृत्यु का कारण बन सकती है। मैदान की चौड़ी सड़क और पहाड़ की संकरी सड़क के खतरे एक जैसे नहीं होते। यहां थोड़ी सी मिट्टी, सड़क पर पड़ा एक पत्थर, टूटा हुआ किनारा या पानी से भरा गड्ढा भी गंभीर दुर्घटना करा सकता है। इसलिए पहाड़ों में सड़क निर्माण और रखरखाव के मानक अधिक कठोर होने चाहिए। विडंबना यह है कि यहां मानकों की जरूरत अधिक है लेकिन उनकी अनदेखी भी सबसे अधिक दिखाई देती है।
उत्तराखंड में राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर ग्रामीण संपर्क मार्गों तक अनेक स्थानों पर सुरक्षा मानक केवल कागजों में पूरे दिखाई देते हैं। कहीं सड़क किनारे पैरापिट नहीं हैं। कहीं पुराने पैरापिट टूटकर खाई में गिर चुके हैं। कहीं क्रैश बैरियर केवल कुछ चुनिंदा मोड़ों पर लगाए गए हैं। कई मार्गों पर नालियां न होने से बरसात का पानी सड़क को काटता रहता है। पहाड़ी से गिरते पत्थर, भूधंसाव, संकरी पुलिया, अंधे मोड़ और धंसती सड़क के खतरे लगातार बने रहते हैं। इसके बाद भी जरूरी चेतावनी बोर्ड नहीं लगाए जाते।
रात में स्थिति और खतरनाक हो जाती है। अनेक सड़कों पर परावर्तक पट्टियां और दिशा सूचक चिह्न नहीं हैं। चालक को सड़क की वास्तविक चौड़ाई का अनुमान नहीं लग पाता। कोहरे और बारिश में खतरा कई गुना बढ़ जाता है। सड़क का किनारा कहां समाप्त हो रहा है और खाई कहां से शुरू हो रही है, इसका पता लगाना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में दुर्घटना होने पर केवल चालक को दोष देना अन्याय है।
संबंधित विभाग इन परिस्थितियों से अनजान नहीं हैं। सड़क अभियंता निरीक्षण करते हैं। अधिकारी दौरे करते हैं। समीक्षा बैठकें होती हैं। मानसून और आपदा से पहले तैयारियों के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद वर्षों पुराने दुर्घटना संभावित स्थान जस के तस बने रहते हैं। बार-बार लोगों की जान जाने के बाद भी वहां सुरक्षा के स्थायी उपाय नहीं किए जाते।
यदि किसी स्थान का खतरा प्रशासन और विभाग को पहले से ज्ञात था और सुधार संभव होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तो वहां हुई मृत्यु को केवल दुर्घटना नहीं कहा जा सकता। यह संस्थागत लापरवाही से हुई मृत्यु है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय होनी चाहिए। यह पूछा जाना चाहिए कि शिकायत कब मिली थी। निरीक्षण कब किया गया था। सुधार की संस्तुति किसने की थी और बजट उपलब्ध होने के बाद भी काम क्यों नहीं हुआ।
उत्तराखंड के विकास का एक कटु चेहरा वीआईपी मार्गों पर दिखाई देता है। जिस रास्ते से किसी मंत्री, बड़े अधिकारी या राजनीतिक पदाधिकारी का काफिला गुजरना होता है वहां अचानक मशीनें पहुंच जाती हैं। गड्ढे भर दिए जाते हैं। चूना छिड़क दिया जाता है। झाड़ियां काट दी जाती हैं। सड़क साफ कर दी जाती है और कुछ घंटों में पूरा प्रशासन सक्रिय दिखाई देने लगता है।
दूसरी ओर उसी जिले के दूरस्थ गांवों को जोड़ने वाली सड़कें महीनों और वर्षों तक टूटी रहती हैं। वहां रहने वाले नागरिकों की शिकायतें कार्यालयों में पड़ी रहती हैं। लोग ज्ञापन देते हैं और अधिकारियों के चक्कर लगाते हैं। उन्हें हर बार बजट न होने या प्रस्ताव शासन को भेजे जाने का उत्तर मिलता है। शायद वे नागरिक व्यवस्था की प्राथमिकता में इसलिए नहीं आते क्योंकि उनके रास्ते से किसी वीआईपी का काफिला नहीं गुजरता।
यह वीआईपी केंद्रित कार्यसंस्कृति प्रशासनिक भेदभाव का उदाहरण है। सड़क की मरम्मत किसी नेता की यात्रा देखकर नहीं होनी चाहिए। मरम्मत का निर्णय नागरिकों की आवश्यकता और सुरक्षा के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र में सीमांत गांव के नागरिक का जीवन भी उतना ही मूल्यवान है जितना राजधानी में रहने वाले व्यक्ति का जीवन। सरकार के लिए सड़क का महत्व उस पर चलने वाले वाहनों की संख्या से नहीं बल्कि उससे जुड़े लोगों की आवश्यकता से तय होना चाहिए।
प्रथम पंक्ति और अंतिम पंक्ति के बीच बढ़ती खाई का सबसे स्पष्ट प्रमाण यही है कि शहर के वीआईपी मार्ग पर छोटा गड्ढा भी शासन को बेचैन कर देता है। दूसरी ओर सीमांत गांव की पूरी सड़क बह जाने पर भी ग्रामीणों को महीनों इंतजार करना पड़ता है। सड़क बंद होने से बच्चों की पढ़ाई रुकती है। मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते। किसानों की उपज बाजार तक नहीं पहुंचती। इसके बाद भी प्रशासन की प्राथमिकताएं नहीं बदलतीं।
कई गांवों में लोग स्वयं चंदा जुटाकर सड़क काटने, मलबा हटाने और गड्ढे भरने को मजबूर हैं। जिन नागरिकों ने सरकार को कर दिया, वोट दिया और विकास के वादों पर भरोसा किया उन्हीं को अपने हाथों से सड़क बनानी पड़ रही है। इसे ग्रामीणों की आत्मनिर्भरता बताकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। यह शासन की विफलता का प्रमाण है।
बिना तकनीकी सर्वेक्षण और सुरक्षा मानकों के ग्रामीणों द्वारा काटी गई सड़क भविष्य में बड़ा खतरा बन सकती है। लोग ऐसा अपनी इच्छा से नहीं करते। प्रशासन जब रास्ता नहीं देता तब मजबूरी उन्हें जोखिम उठाने के लिए विवश करती है। सरकार को समझना होगा कि सड़क बनाना केवल पहाड़ काट देना नहीं है। मजबूत दीवारें, जल निकासी, सुरक्षित मोड़, पैरापिट और नियमित रखरखाव भी सड़क निर्माण का हिस्सा हैं।
राजनीतिक व्यवस्था की प्राथमिकताएं भी कम चिंताजनक नहीं हैं। जिला योजना, राज्य योजना और केंद्र सरकार की योजनाओं के नाम पर घोषणाएं होती हैं। शिलान्यास पट्टिकाएं लगती हैं। मंच सजते हैं। मंत्री, विधायक और सांसद मामूली रिबन काटने के लिए पूरे सरकारी तंत्र के साथ पहुंच जाते हैं। कैमरों के सामने विकास का दावा किया जाता है। उसके बाद सड़क की गुणवत्ता, समयसीमा और रखरखाव की जवाबदेही गायब हो जाती है।
जनप्रतिनिधियों को बताना चाहिए कि निर्माण पूरा होने के बाद उन्होंने कितनी सड़कों का निरीक्षण किया। घटिया सड़क बनाने वाले कितने ठेकेदारों पर कार्रवाई हुई। कितने अभियंताओं की जवाबदेही तय की गई। कितनी योजनाओं की स्वतंत्र गुणवत्ता जांच कराई गई। यदि इन प्रश्नों का उत्तर मौन है तो शिलान्यास और लोकार्पण विकास नहीं बल्कि सार्वजनिक धन पर आयोजित राजनीतिक प्रदर्शन हैं।
नेताओं को उद्घाटन का श्रेय चाहिए लेकिन सड़क टूटने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता। योजना स्वीकृत हो तो उपलब्धि जनप्रतिनिधि की बताई जाती है। सड़क खराब हो जाए तो दोष विभाग और ठेकेदार पर डाल दिया जाता है। विभाग ठेकेदार को दोष देता है और ठेकेदार मौसम को जिम्मेदार ठहरा देता है। इस तरह पूरी व्यवस्था जिम्मेदारी को एक मेज से दूसरी मेज पर भेजती रहती है।
प्रशासन की भूमिका निष्पक्ष निगरानी और जनसुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके विपरीत कई बार उसकी पूरी ऊर्जा राजनीतिक नेतृत्व को प्रसन्न रखने में खर्च होती दिखाई देती है। अधिकारी जनता की शिकायत पर जितनी तेजी नहीं दिखाते उससे कई गुना अधिक तत्परता वीआईपी कार्यक्रम की तैयारी में दिखाते हैं। जनता के आवेदन फाइलों में घूमते रहते हैं लेकिन नेता के मौखिक निर्देश पर मशीनें उसी दिन पहुंच जाती हैं। यह कार्यसंस्कृति प्रशासन को संवैधानिक व्यवस्था से राजनीतिक सुविधा तंत्र में बदल देती है।
दुर्घटना के बाद चालक की गति, नशे और वाहन की फिटनेस की जांच अवश्य होनी चाहिए। लापरवाह वाहन चलाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन जांच केवल चालक पर समाप्त नहीं होनी चाहिए। सड़क की चौड़ाई कितनी थी। सड़क के किनारे सुरक्षा अवरोध था या नहीं। गड्ढे की सूचना विभाग को कब मिली थी। अंतिम निरीक्षण कब हुआ था। उस स्थान पर पहले कितनी दुर्घटनाएं हुई थीं। निर्माण सामग्री की गुणवत्ता कैसी थी। चेतावनी बोर्ड और रात्रिकालीन परावर्तक लगे थे या नहीं। इन सभी तथ्यों की जांच होनी चाहिए।
चालक दोषी पाया जाता है तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई हो। सड़क की खराबी और विभागीय लापरवाही प्रमाणित होने पर संबंधित अधिकारी, निर्माण एजेंसी और ठेकेदार की भी आपराधिक तथा आर्थिक जवाबदेही तय की जाए। केवल स्थानांतरण, स्पष्टीकरण या विभागीय नोटिस किसी मृतक के परिवार के लिए न्याय नहीं है। निचले कर्मचारी पर जिम्मेदारी डालकर वरिष्ठ अधिकारियों और नीति निर्माताओं को बचाने की परंपरा भी बंद होनी चाहिए।
राज्य सरकार को सभी पर्वतीय मार्गों का समयबद्ध सड़क सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए। दुर्घटना संभावित स्थानों की सार्वजनिक सूची तैयार हो। प्रत्येक स्थान के सुधार की अंतिम तिथि घोषित की जाए। गड्ढों, टूटे पैरापिट, धंसती सड़क और मलबे की शिकायत के लिए पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए। नागरिक फोटो और स्थान के साथ शिकायत दर्ज कर सकें। शिकायत की स्थिति और समाधान की समयसीमा भी सार्वजनिक होनी चाहिए।
प्रत्येक निर्माणाधीन सड़क पर निर्माण एजेंसी, ठेकेदार, लागत, कार्य अवधि, रखरखाव अवधि और जिम्मेदार अभियंता का विवरण लिखा जाना चाहिए। गुणवत्ता की जांच उसी विभाग की औपचारिकता न बने। इसे स्वतंत्र तकनीकी संस्था से कराया जाना चाहिए। सड़क खराब मिलने पर ठेकेदार को केवल काली सूची में डालना पर्याप्त नहीं है। उससे सार्वजनिक धन की वसूली और दुर्घटना की स्थिति में कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए।
पर्वतीय सड़क सुरक्षा को केवल लोक निर्माण विभाग के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। परिवहन विभाग, पुलिस, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य विभाग, ग्रामीण विकास और जिला प्रशासन को संयुक्त रूप से जिम्मेदार बनाना होगा। दुर्घटना के बाद राहत पहुंचाना आवश्यक है लेकिन उससे अधिक जरूरी दुर्घटना को रोकना है। एम्बुलेंस, ट्रॉमा सेंटर और बचाव दल के साथ सुरक्षित सड़क निर्माण पर प्राथमिक निवेश करना होगा।
उत्तराखंड को अब तय करना होगा कि वह दुर्घटनाओं के बाद शोक संदेश जारी करने वाला राज्य बनेगा या दुर्घटनाओं को रोकने वाला जिम्मेदार राज्य। हर हादसे के बाद संवेदना जताना, मुआवजा घोषित करना और जांच समिति बनाना शासन नहीं है। शासन वह है जो पहली शिकायत पर गड्ढा भरे। पत्थर गिरने पर सुरक्षा जाल लगाए। दुर्घटना संभावित स्थान को समय रहते सुधारे और घटिया निर्माण के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करे।
पहाड़ के नागरिकों को दया नहीं चाहिए। उन्हें समान अधिकार चाहिए। उन्हें चुनावी घोषणा नहीं बल्कि सुरक्षित सड़क चाहिए। उन्हें शिलान्यास की पट्टिका नहीं बल्कि मजबूत पैरापिट चाहिए। उन्हें वीआईपी यात्रा से एक दिन पहले होने वाली सफाई नहीं बल्कि पूरे वर्ष सक्रिय प्रशासन चाहिए। उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जो हर मृत्यु के बाद चालक को अकेला अपराधी घोषित करके स्वयं को निर्दोष साबित न करे।
उत्तराखंड की सड़कों पर बहता खून व्यवस्था से पूछ रहा है कि क्या नागरिक के जीवन की कीमत मार्ग की राजनीतिक उपयोगिता से तय होगी। यदि अंतिम गांव का व्यक्ति भी इस राज्य का समान नागरिक है तो उसकी सड़क, उसकी सुरक्षा और उसका जीवन भी राजधानी के वीआईपी मार्ग जितना महत्वपूर्ण होना चाहिए।
अब बहानों का समय समाप्त हो चुका है। सड़क दुर्घटनाओं को नियति बताना बंद करना होगा। जिस स्थान का खतरा पहले से ज्ञात हो और समाधान उपलब्ध होने के बाद भी व्यवस्था मौन रहे वहां होने वाली मृत्यु केवल दुर्घटना नहीं होती। वह शासन, राजनीति और प्रशासन की सामूहिक जवाबदेही पर लगा रक्तरंजित प्रश्नचिह्न होती है।



