पिथौरागढ़। उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के दो शिक्षकों ने राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त कर प्रदेश का गौरव बढ़ाया है। राजकीय आदर्श प्राथमिक विद्यालय जाजर चिंगरी के प्रधानाध्यापक चंद्रशेखर जोशी को ‘आचार्य चाणक्य पुरस्कार’ तथा उच्च प्राथमिक विद्यालय बेड़ा के सहायक अध्यापक गोकुल गिरी को ‘राधाकृष्णन सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में 5 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित षष्ठम राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान समारोह में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया।
चौधरी केहर सिंह एजुकेशनल ट्रस्ट, बड़ौत-बागपत की ओर से आयोजित इस समारोह में देश के 22 राज्यों के 101 शिक्षकों को शिक्षा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान, नवाचारों, शैक्षणिक उपलब्धियों और प्रेरणादायी कार्यों के लिए सम्मानित किया गया।
प्रधानाध्यापक चंद्रशेखर जोशी ने अपने विद्यालय में किए गए शैक्षणिक नवाचारों और उत्तराखंड में अपनाई जा रही बेहतर शिक्षण पद्धतियों को राष्ट्रीय मंच पर साझा किया। उनके प्रयासों और अन्य शिक्षकों को प्रेरित करने की भूमिका के लिए उन्हें ‘आचार्य चाणक्य पुरस्कार’ प्रदान किया गया।
वहीं, उच्च प्राथमिक विद्यालय बेड़ा के सहायक अध्यापक गोकुल गिरी को शैक्षणिक क्षेत्र में उनके योगदान के लिए ‘राधाकृष्णन सम्मान’ से नवाजा गया। दोनों शिक्षकों की उपलब्धि यह संदेश देती है कि सीमांत और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक भी अपने समर्पण, रचनात्मक सोच और निरंतर प्रयासों से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकते हैं।
यह सम्मान केवल दो शिक्षकों की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उत्तराखंड के उन तमाम शिक्षकों के लिए भी प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बीच बच्चों के भविष्य को संवारने में जुटे हैं।
दो शिक्षकों की इस उपलब्धि के बीच उत्तराखंड के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। पहाड़ के अनेक गांवों में विद्यालयों तक पहुंचने के लिए बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कहीं विद्यालय भवनों की स्थिति चिंता का विषय है, तो कहीं पर्याप्त कक्ष-कक्षों, शिक्षण संसाधनों और अन्य बुनियादी सुविधाओं की जरूरत बनी हुई है।
घटती छात्र संख्या और सरकारी विद्यालयों के बंद होने या दूसरे विद्यालयों में समायोजित किए जाने की स्थिति भी ग्रामीण शिक्षा के सामने एक बड़ी चुनौती है। पलायन, गांवों में बच्चों की कम होती संख्या और निजी विद्यालयों की ओर बढ़ते रुझान जैसे कारणों का स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आकलन किया जाना जरूरी है।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि कितने शिक्षकों को राष्ट्रीय सम्मान मिला, बल्कि यह भी है कि इन शिक्षकों के अनुभवों और नवाचारों का लाभ उन विद्यालयों तक कैसे पहुंचे, जहां संसाधनों की कमी के बावजूद शिक्षक बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास कर रहे हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित शिक्षकों के अनुभवों को प्रदेश की शिक्षा नीति और विद्यालय सुधार कार्यक्रमों से जोड़ना समय की मांग है। ग्रामीण विद्यालयों में सुरक्षित एवं पर्याप्त भवन, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, बिजली, डिजिटल शिक्षण सुविधाएं और विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
इसके साथ ही कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को बंद करने या विलय करने से पहले स्थानीय परिस्थितियों, बच्चों की दूरी, भौगोलिक कठिनाइयों और भविष्य में शिक्षा तक उनकी पहुंच का आकलन जरूरी है। दुर्गम क्षेत्रों में विद्यालयों को बनाए रखने के लिए विशेष प्रोत्साहन और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप योजनाएं भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
चंद्रशेखर जोशी और गोकुल गिरी जैसे शिक्षकों के नवाचारों को अन्य विद्यालयों तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षण, अनुभव साझा करने के कार्यक्रम और संसाधनों का सहयोग उपयोगी साबित हो सकता है।
पिथौरागढ़ के इन दोनों शिक्षकों की उपलब्धि उम्मीद जगाती है कि समर्पित प्रयासों से पहाड़ की शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव संभव है। लेकिन इस उपलब्धि का व्यापक लाभ तभी मिलेगा, जब राष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित शिक्षकों के अनुभवों को जमीनी स्तर पर लागू करने के साथ ग्रामीण विद्यालयों की बुनियादी समस्याओं का समाधान भी किया जाए।
पहाड़ के बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए अपने गांव और क्षेत्र से दूर जाने की मजबूरी न हो, सरकारी विद्यालयों पर अभिभावकों का भरोसा मजबूत हो और हर बच्चे को समान अवसर मिले—यही किसी भी शिक्षक सम्मान की सबसे बड़ी सार्थकता होगी ।


