थल : दौलिकौली/बीजानी। सरकार लगातार रिवर्स पलायन को बढ़ावा देने की बात करती है, गांवों में मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने और पहाड़ के खाली होते गांवों को फिर से आबाद करने के दावे किए जाते हैं। लेकिन सीमांत क्षेत्र के कई गांवों की जमीनी तस्वीर इन दावों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
ग्राम सभा दौलिकौली के तोक बीजानी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। कभी यहां 27 परिवार रहते थे, लेकिन सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में अब महज 10 परिवार ही बचे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, इन परिवारों में भी अधिकांश बुजुर्ग लोग हैं। युवा पीढ़ी रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में गांव छोड़ चुकी है।
बीजानी गांव मुख्य सड़क से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर है। दूरी भले ही कम हो, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह एक किलोमीटर आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। गांव तक पहुंचने वाले रास्ते जगह-जगह झाड़ियों से बंद हैं। बारिश के दौरान पैदल आवाजाही और भी मुश्किल हो जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि रास्तों में उगी झाड़ियों के कारण स्कूली बच्चों को आए दिन परेशानी होती है। जंगली जानवरों का डर अलग बना रहता है। बारिश में बच्चे झाड़ियों के बीच से गुजरते हुए स्कूल पहुंचते हैं और कई बार पूरी तरह भीग जाते हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि जंगली जानवरों की बढ़ती आवाजाही और खेती से जुड़ी मुश्किलों के कारण कृषि कार्य भी लगभग बंद हो गया है। कभी आबाद रहने वाला यह गांव अब धीरे-धीरे बंजर और जंगल में तब्दील होता जा रहा है।
सवाल यह है कि जिस गांव में लोगों के लिए रोजमर्रा की मूलभूत सुविधाओं तक पहुंचना मुश्किल हो, वहां सरकार की रिवर्स पलायन की नीति आखिर कितनी कारगर हो सकती है ? बीजानी के बच्चों को शिक्षा के लिए करीब 1.5 किलोमीटर दूर धारकोली जाना पड़ता है, जहां दसवीं तक की शिक्षा उपलब्ध है। इसके बाद इंटर की पढ़ाई के लिए विद्यार्थियों को थल जाना पड़ता है।
ग्रामीणों के सामने सवाल सिर्फ स्कूल की दूरी का नहीं, बल्कि वहां तक सुरक्षित पहुंचने का भी है। खराब रास्ते, झाड़ियां और जंगली जानवरों का डर बच्चों की परेशानी बढ़ाते हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। ग्रामीणों को उपचार के लिए करीब 5 किलोमीटर दूर थल जाना पड़ता है। गांव से मुख्य सड़क तक पहुंचने वाला रास्ता खराब होने के कारण बीमार या बुजुर्ग मरीज को डोली में ले जाना तक मुश्किल हो जाता है। ऐसे में गंभीर स्थिति में मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाना ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
ग्रामीणों के अनुसार, सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाओं को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विधायक से कई बार मांग की जा चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि हर बार आश्वासन तो मिलता है, लेकिन धरातल पर समस्या जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीणों की सबसे बड़ी मांग है कि टोपरा धार के लिए कटी हुई लिंक रोड को आगे जोड़कर बीजानी को सड़क संपर्क से जोड़ा जाए। उनका कहना है कि यदि यह लिंक रोड बीजानी तक पहुंचती है तो केवल एक गांव ही नहीं, बल्कि आसपास के कई क्षेत्रों को भी इसका लाभ मिल सकता है।
बीजानी की कहानी केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि पहाड़ के उन तमाम गांवों की तस्वीर है जहां लोग अपने घर, खेत और पुश्तैनी जमीन छोड़ने को मजबूर हुए हैं।
अगर कोई परिवार अपने गांव वापस लौटकर रिवर्स पलायन करना भी चाहे, तो वह लौटे कैसे ? जब गांव तक सड़क नहीं, बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था नहीं, स्वास्थ्य सुविधा दूर है, रास्ते जंगली जानवरों और झाड़ियों से घिरे हैं और खेती करना भी सुरक्षित नहीं रह गया है, तो क्या सिर्फ योजनाओं और घोषणाओं के भरोसे गांव दोबारा आबाद हो पाएंगे ?
क्या सरकार बीजानी जैसे गांवों की जमीनी समस्याओं को दूर कर वास्तव में रिवर्स पलायन की राह आसान कर पाएगी ? या फिर आने वाले वर्षों में दौलिकौली का बीजानी भी उन गांवों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहां कभी घरों में चूल्हे जलते थे, खेतों में फसलें लहलहाती थीं और बच्चों की आवाजें गूंजती थीं—लेकिन अब वहां सिर्फ खाली मकान, जंगल और सन्नाटा रह गया है? यह सवाल सरकार और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों से है।
थल से कमलेश जोशी की रिपोर्ट


