देश में इन दिनों वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। एक ओर कांग्रेस नेता सोनिया गांधी द्वारा वंदे मातरम् के पूरे गीत का गायन नहीं किए जाने को लेकर भाजपा समर्थकों और नेताओं की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पर भाजपा की कुछ सभाओं के ऐसे वीडियो भी चर्चा में हैं, जिनमें वंदे मातरम् की फिल्मी धुन बजती दिखाई दे रही है।

इसी के साथ कुछ कार्यक्रमों में राष्ट्रीय ध्वज के स्थान या उसके साथ पार्टी के झंडे के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह है कि राष्ट्रभक्ति के प्रतीकों को लेकर राजनीतिक दल दूसरों से जिस मर्यादा और नियमों की अपेक्षा करते हैं, क्या वही मानदंड अपने कार्यक्रमों पर भी लागू करते हैं?

मुद्दा किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रभावना जैसे संवेदनशील प्रतीकों की गरिमा का है। यदि किसी नेता द्वारा वंदे मातरम् पूरा नहीं गाया जाता तो उस पर सवाल उठाना राजनीतिक बहस का हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसी कसौटी पर राजनीतिक दलों के अपने कार्यक्रमों और मंचों की तस्वीरों व वीडियो को भी परखा जाना चाहिए।

आखिर सवाल यही है—राष्ट्रभक्ति के प्रतीक राजनीति का हथियार बनेंगे या उनकी गरिमा और नियमों का समान रूप से सम्मान होगा? Kapil _ Vaninews