पिथौरागढ़। पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने के उद्देश्य से ग्रामसभा बस्तड़ी के उड़मा गांव के निवासी एवं वर्तमान में जीआईसी जौरासी में कार्यरत शिक्षक धीरज खड़ायत ने एक सराहनीय पहल शुरू की है। वर्षों से अपने व्यक्तिगत संसाधनों से पौधरोपण कर रहे धीरज खड़ायत का मानना है कि केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें जीवित रखना और वृक्ष बनने तक उनकी देखभाल करना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
धीरज खड़ायत बताते हैं कि अब तक हर वर्ष गांव में पौधे लगाए जाते रहे हैं, लेकिन उचित देखभाल के अभाव में अधिकांश पौधे कुछ समय बाद नष्ट हो जाते हैं। इसी समस्या का स्थायी समाधान निकालने के लिए उन्होंने इस वर्ष एक नई योजना बनाई है, जिसमें पौधे लगाने के साथ-साथ ग्रामीणों को उनकी देखभाल के लिए प्रोत्साहित भी किया जाएगा।
इस अभियान के तहत ग्रामसभा बस्तड़ी के पूरे गांव में विभिन्न प्रजातियों के पौधों का वितरण किया जाएगा। इसके लिए डीडीहाट के घोरपट्टा नर्सरी से देवदार, बांज, दालचीनी और सीलिंग सहित अन्य स्थानीय प्रजातियों के पौधों की व्यवस्था की गई है। इन पौधों को गांव के विभिन्न स्थानों और परिवारों के माध्यम से लगाया जाएगा, ताकि आने वाले वर्षों में खाली पड़ी भूमि हरे-भरे जंगल का रूप ले सके।
योजना के अनुसार, लगाए गए पौधों का चार वर्ष बाद मूल्यांकन किया जाएगा। जिन लोगों के पौधे सबसे अच्छे, स्वस्थ और सुरक्षित पाए जाएंगे, उन्हें प्रथम पुरस्कार ₹5000, द्वितीय पुरस्कार ₹3000 और तृतीय पुरस्कार ₹2000 प्रदान किए जाएंगे। इसके अलावा जिन लोगों के पौधे सुरक्षित और अच्छी स्थिति में होंगे, उन्हें भी सांत्वना पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा।
सबसे खास बात यह है कि इन पुरस्कारों के लिए किसी सरकारी योजना या संस्था से आर्थिक सहायता नहीं ली जा रही है। धीरज खड़ायत स्वयं अपनी मासिक वेतन से पुरस्कार राशि उपलब्ध कराएंगे। उनका कहना है कि यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे, तो हर गांव को फिर से हराभरा बनाया जा सकता है।
धीरज खड़ायत ने कहा कि "हमारा सपना है कि आज जो भूमि खाली दिखाई देती है, वह आने वाले वर्षों में एक सघन और समृद्ध जंगल के रूप में विकसित हो। पर्यावरण को सुरक्षित रखना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का नैतिक दायित्व है। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी हमारा भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।"
उन्होंने यह भी अपेक्षा जताई कि इस जनहित और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अभियान में राज्य सरकार, वन विभाग, जिला प्रशासन तथा अन्य सामाजिक संस्थाएं भी सहयोग के लिए आगे आएं, ताकि इस पहल को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया जा सके और अन्य गांव भी इससे प्रेरणा लेकर ऐसे अभियान शुरू करें।
ग्रामीणों ने शिक्षक धीरज खड़ायत की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यदि पौधरोपण को प्रतियोगिता और जिम्मेदारी से जोड़ा जाए तो पौधों के जीवित रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाएगी। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह अभियान आने वाले वर्षों में उड़मा गांव को हरियाली की नई पहचान दिला सकता है और पर्यावरण संरक्षण का एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।
"पर्यावरण सुरक्षित है तो हम सुरक्षित हैं" के संदेश के साथ शुरू हो रही यह पहल केवल पौधरोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी और जनभागीदारी का एक प्रेरणादायक उदाहरण भी बन सकती है।
रिपोर्ट: वाणी न्यूज़


