पिथौरागढ़। उत्तराखंड की चर्चित कलाकार और भोजपुरी मनोरंजन जगत में भी अपनी पहचान बना चुकीं श्वेता महरा की एक सोशल मीडिया पोस्ट इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। श्वेता महरा ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा—“Awards bikne ka time aa gaya hain, har saal ki tarah is saal bhi…”। पोस्ट में उन्होंने एक गीत/कलाकार को लेकर अपनी नाराजगी भी जाहिर की और लिखा कि उन्हें यह बात बहुत बुरी लगी है।
श्वेता महरा की इस पोस्ट को यंग उत्तराखंड सिने अवॉर्ड से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, उनकी पोस्ट में किसी व्यक्ति या संस्था का स्पष्ट नाम लेकर आरोप नहीं लगाया गया है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनका निशाना वास्तव में किस निर्णय या किस अवॉर्ड की ओर था। बावजूद इसके, सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट के बाद पुरस्कारों की निष्पक्षता और कलाकारों की नाराजगी को लेकर बहस शुरू हो गई है।
एक प्रतिक्रिया में श्वेता का सम्मान, लेकिन सवाल भी श्वेता महरा की पोस्ट पर आई प्रतिक्रियाओं में एक प्रतिक्रिया ऐसी भी रही, जिसमें उनके कलाकार के रूप में योगदान की सराहना करते हुए उनके बयान के तरीके पर सवाल उठाया गया।
प्रतिक्रिया में कहा गया कि “श्वेता महरा जी, मुझे आपके गाने बहुत अच्छे लगते हैं और आपकी अदाकारी भी अच्छी लगती है।” प्रतिक्रिया देने वाले ने उन्हें उत्तराखंड के प्रमुख कलाकारों में बताते हुए कहा कि प्रदेश की म्यूजिक और फिल्म इंडस्ट्री अभी अपने उभरते दौर में है। ऐसे समय में पुरस्कारों को लेकर इस तरह के गंभीर आरोप लगाने से पहले चयन प्रक्रिया और तथ्यों को सामने रखना ज्यादा उचित होगा।
प्रतिक्रिया में यह भी कहा गया कि किसी कलाकार को पुरस्कार न मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पुरस्कार व्यवस्था गलत है या कलाकार में प्रतिभा की कमी है।
ऑस्कर का उदाहरण देकर समझाया ‘हर कलाकार का अपना समय’
अपनी बात समझाने के लिए प्रतिक्रिया देने वाले ने हॉलीवुड के प्रतिष्ठित ऑस्कर अवॉर्ड का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे कई दिग्गज कलाकार रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक शानदार काम करने के बावजूद ऑस्कर नहीं जीता।
जॉनी डेप, टॉम क्रूज, ब्रैडली कूपर और एमी एडम्स जैसे चर्चित कलाकारों का उदाहरण देते हुए प्रतिक्रिया में कहा गया कि लंबे और सफल करियर के बावजूद यदि किसी कलाकार को कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिलता, तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि पुरस्कार “बिका हुआ” है या उस कलाकार में प्रतिभा की कमी है।
इसी क्रम में लियोनार्डो डिकैप्रियो का उदाहरण देते हुए कहा गया कि शानदार अभिनय और लंबे करियर के बावजूद उन्हें भी ऑस्कर के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। आखिरकार उन्हें 2016 में The Revenant के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर मिला।
प्रतिक्रिया का मूल संदेश था कि पुरस्कार कलाकार की पूरी प्रतिभा का अंतिम पैमाना नहीं होता और हर कलाकार का सम्मान मिलने का अपना समय हो सकता है।
“शायद आपका अभी टाइम नहीं है”
श्वेता महरा के लिए प्रतिक्रिया में आगे कहा गया कि उनकी प्रतिभा पर किसी तरह का संदेह नहीं है। उन्होंने लिखा कि “शायद आपका अभी टाइम ना हो, आपका समय जरूर आएगा।”
यानी प्रतिक्रिया में श्वेता की आलोचना करते हुए भी उनके कलाकार के रूप में सम्मान को बरकरार रखा गया। यही बात इस पूरे विवाद को केवल विरोध या समर्थन की बहस से आगे ले जाती है।
भोजपुरी और हरियाणवी इंडस्ट्री का भी उठा सवाल प्रतिक्रिया में श्वेता महरा के अलग-अलग क्षेत्रीय मनोरंजन उद्योगों में काम करने को लेकर भी एक सवाल उठाया गया। कहा गया कि श्वेता उत्तराखंड के साथ-साथ भोजपुरी और हरियाणवी मनोरंजन जगत में भी काम कर चुकी हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि किसी पुरस्कार में मनमुताबिक परिणाम नहीं आने पर पूरी अवॉर्ड व्यवस्था पर सवाल उठाया जाता है, तो क्या यही कसौटी अन्य क्षेत्रीय फिल्म और म्यूजिक इंडस्ट्री के पुरस्कारों पर भी लागू होगी?
हालांकि, यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी कलाकार को अपनी निराशा या असहमति व्यक्त करने का अधिकार है। लेकिन सार्वजनिक मंच पर लगाए गए गंभीर आरोपों के साथ तथ्य और ठोस आधार सामने हों, तो बहस अधिक सार्थक और विश्वसनीय बनती है।
ज्यूरी और दूसरे कलाकारों के सम्मान की अपील प्रतिक्रिया देने वाले ने श्वेता महरा से अन्य कलाकारों और अवॉर्ड की ज्यूरी के सम्मान की भी अपील की। उनका कहना था कि पुरस्कार किसी एक कलाकार के लिए नहीं बल्कि पूरी इंडस्ट्री के लिए मंच होते हैं और ज्यूरी में शामिल लोगों के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर, यदि किसी कलाकार को चयन प्रक्रिया पर वास्तविक आपत्ति है, तो आयोजकों से सवाल पूछना और नामांकन, ज्यूरी तथा चयन के मानदंड सार्वजनिक करने की मांग करना भी एक लोकतांत्रिक और रचनात्मक रास्ता हो सकता है।
विवाद से ज्यादा जरूरी है पारदर्शिता इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि आखिर अवॉर्ड की चयन प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। किस आधार पर कलाकारों का चयन किया गया, ज्यूरी में कौन लोग शामिल थे और विजेताओं तक पहुंचने के लिए कौन से मानदंड अपनाए गए—यदि इन सवालों के जवाब सार्वजनिक हों तो विवाद की गुंजाइश काफी कम हो सकती है।
श्वेता महरा की पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे कलाकार की नाराजगी और व्यंग्य मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे पुरस्कार व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी के रूप में देख रहे हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि श्वेता महरा ने “अवॉर्ड बिकने” की टिप्पणी किस विशेष निर्णय या परिस्थिति के संदर्भ में की थी। इसलिए उनके बयान को किसी पुरस्कार के वास्तव में बिकने का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
अब देखना यह है कि श्वेता महरा इस पोस्ट के संदर्भ में आगे कोई स्पष्टीकरण देती हैं या नहीं और यंग उत्तराखंड सिने अवॉर्ड के आयोजकों की ओर से चयन प्रक्रिया को लेकर कोई जवाब सामने आता है या नहीं।
क्योंकि अंततः सवाल सिर्फ एक कलाकार को अवॉर्ड मिलने या न मिलने का नहीं है—सवाल यह भी है कि उत्तराखंड की तेजी से उभरती फिल्म और म्यूजिक इंडस्ट्री अपने कलाकारों का सम्मान किस तरह करे कि पुरस्कार पाने वाले और पुरस्कार से वंचित रहने वाले, दोनों ही इस प्रक्रिया पर भरोसा कायम रख सकें। _VANINEWS


