पिथौरागढ़। विश्व युवा कौशल दिवस के अवसर पर मितांश फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित "करियर काउंसलिंग, युवा प्रेरणा एवं जन-जागरूकता महोत्सव–2026" का उद्देश्य जिले के युवाओं को करियर, कौशल विकास, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में विशेषज्ञ मार्गदर्शन उपलब्ध कराना था। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता देश के प्रसिद्ध इतिहासकार, लेखक और प्रेरक वक्ता आर.के. सूर्यवंशी थे, जो विशेष रूप से पिथौरागढ़ के युवाओं का मार्गदर्शन करने पहुंचे थे।

आयोजकों के अनुसार कार्यक्रम के आयोजन से पहले मुख्य शिक्षा अधिकारी को पत्र भेजकर जिले के सभी राजकीय, अशासकीय एवं मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों के कक्षा 11 एवं 12 के विद्यार्थियों को निःशुल्क भाग लेने के लिए आमंत्रित करने का अनुरोध किया गया। इसके बाद महाविद्यालय प्रशासन से परिसर में कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति भी प्राप्त की गई। कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार सोशल मीडिया, व्हाट्सएप समूहों और अन्य माध्यमों से सार्वजनिक रूप से किया गया।

लेकिन कार्यक्रम शुरू होने के कुछ ही देर बाद छात्रसंघ के कुछ पदाधिकारी और उनके साथ पहुंचे छात्रों ने सभागार में पहुंचकर विरोध शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि उन्हें कार्यक्रम की पूर्व सूचना नहीं दी गई तथा सरकारी महाविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में स्थानीय सरकारी शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों की अपेक्षा निजी विद्यालयों के छात्रों की भागीदारी अधिक रही। इसी आधार पर उन्होंने कार्यक्रम को तत्काल बंद करने की मांग की।

आयोजकों और उपस्थित लोगों द्वारा काफी समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन विरोध जारी रहा और अंततः बढ़ते तनाव के बीच कार्यक्रम को बीच में ही रोकना पड़ा। इसका सीधा असर उन सैकड़ों छात्र-छात्राओं पर पड़ा, जो अपने भविष्य को लेकर मार्गदर्शन लेने की उम्मीद से कार्यक्रम में पहुंचे थे।

सबसे बड़ा सवाल—नुकसान किसका हुआ?

यदि विरोध का उद्देश्य सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करना था, तो क्या कार्यक्रम रुक जाने से उन विद्यार्थियों को करियर मार्गदर्शन मिल गया?

या फिर नुकसान उन सभी छात्रों का हुआ—चाहे वे सरकारी विद्यालय के हों या निजी विद्यालय के—जो विशेषज्ञों से सीखने और अपने भविष्य की दिशा तय करने के लिए वहां पहुंचे थे?

क्या सूचना संबंधी विवाद का समाधान कार्यक्रम के बाद प्रशासन, महाविद्यालय और आयोजकों के साथ बैठकर नहीं निकाला जा सकता था?

पिथौरागढ़ की छवि पर भी सवाल पिथौरागढ़ को शिक्षा और प्रतिभा की भूमि माना जाता है। यदि देशभर के विशेषज्ञ, शिक्षाविद और प्रेरक वक्ता यहां युवाओं का मार्गदर्शन करने आएं और उनका कार्यक्रम विरोध के कारण बीच में ही रोक दिया जाए, तो उनके मन में इस जिले की कैसी छवि बनेगी?

क्या भविष्य में ऐसे वक्ता, शिक्षण संस्थान, विश्वविद्यालय या राष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं पिथौरागढ़ में कार्यक्रम आयोजित करने से पहले दो बार नहीं सोचेंगी?

क्या यह पिथौरागढ़ के भविष्य के लिए सही संदेश है?

आज प्रतियोगिता का दौर है। छोटे शहरों के विद्यार्थियों को बड़े शहरों जैसी जानकारी और अवसर आसानी से नहीं मिल पाते। ऐसे में यदि कोई संस्था निःशुल्क विशेषज्ञों को यहां लाकर युवाओं का मार्गदर्शन करने का प्रयास करती है, तो क्या ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए या विवादों में उलझा देना चाहिए?

यदि आयोजन प्रक्रिया में कोई कमी थी तो उसकी समीक्षा होना भी आवश्यक है, लेकिन क्या किसी कार्यक्रम को बीच में रोक देना ही उसका एकमात्र समाधान था?

कोचिंग संस्थानों पर क्या प्रभाव पड़ सकता था?

करियर काउंसलिंग जैसे कार्यक्रम किसी कोचिंग संस्थान के प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था के पूरक माने जाते हैं। ऐसे आयोजनों से विद्यार्थियों में प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर के प्रति जागरूकता बढ़ती है, जिसका लाभ स्थानीय कोचिंग संस्थानों को भी मिल सकता है, क्योंकि जागरूक छात्र आगे बेहतर तैयारी के लिए कोचिंग का रुख करते हैं।

दूसरी ओर, ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को सही जानकारी देकर उन्हें सोच-समझकर निर्णय लेने में सक्षम बनाते हैं। इससे शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता आधारित प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।

हालांकि, यह कहना कि किसी विशेष कोचिंग संस्थान को इस कार्यक्रम से नुकसान होने वाला था, इसका कोई प्रमाण सामने नहीं है। इसलिए ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

एक और सवाल...

महाविद्यालयों में जब सांस्कृतिक कार्यक्रम, डांस, सिंगिंग प्रतियोगिताएं या मनोरंजन से जुड़े आयोजन होते हैं, तो उन्हें सफल बनाने के लिए सभी मिलकर मेहनत करते हैं।

लेकिन जब बात युवाओं के करियर, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और भविष्य की होती है, तो क्या ऐसे कार्यक्रमों को बीच में रोक देना सही संदेश देता है?

क्या मनोरंजन जितना ही महत्व करियर मार्गदर्शन को भी नहीं मिलना चाहिए?

जनता से सवाल लेकिन क्या किसी कार्यक्रम को बीच में रोक देना उचित था, जब सैकड़ों छात्र-छात्राएं अपने भविष्य के लिए मार्गदर्शन लेने पहुंचे थे?

क्या इस घटना से सबसे अधिक नुकसान उन्हीं विद्यार्थियों का नहीं हुआ, जिनके हित की बात सभी पक्ष कर रहे थे?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पिथौरागढ़ में भविष्य में ऐसे शैक्षणिक और करियर उन्मुख कार्यक्रमों के लिए प्रशासन, आयोजकों और छात्र संगठनों के बीच बेहतर संवाद और समन्वय की आवश्यकता नहीं है?

अब फैसला जनता करे...

क्या यह विरोध उचित था, या विरोध का तरीका अलग हो सकता था?

क्या पिथौरागढ़ को ऐसे कार्यक्रमों का स्वागत कर युवाओं के लिए नए अवसरों का द्वार खोलना चाहिए, या फिर हर सकारात्मक पहल विवादों में उलझती रहे?

अपनी राय हमें कमेंट में अवश्य बताएं।