हरादून। उत्तराखंड में देहरादून–ऋषिकेश राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रस्तावित भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना को लेकर एक ओर जहां विकास की नई संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, वहीं दूसरी ओर हजारों पेड़ों की कटाई को लेकर पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा भी चर्चा के केंद्र में आ गया है। करीब 743 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना का उद्देश्य देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच यातायात को सुगम बनाना, चारधाम यात्रा को बेहतर बनाना तथा बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करना है।
परियोजना के तहत 'सात मोड़' वन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई शुरू होने के बाद पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन इसके लिए जंगलों और जैव विविधता की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। उनका आग्रह है कि ऐसे विकल्पों पर भी विचार किया जाए, जिनसे पर्यावरणीय नुकसान कम से कम हो।
इसी बीच, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने शुक्रवार को परियोजना को लेकर फैल रही भ्रामक जानकारियों पर विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया। एनएचएआई के परियोजना निदेशक (पीआईयू देहरादून) सौरभ सिंह ने कहा कि सड़क की डिजाइन तैयार करते समय पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम रखना प्रमुख प्राथमिकता रही है।
उन्होंने बताया कि वन क्षेत्र में राइट ऑफ वे (ROW) को सामान्य 60 मीटर से घटाकर मात्र 23 मीटर रखा गया है, ताकि अतिरिक्त वन भूमि प्रभावित न हो। परियोजना की डिजाइन उत्तराखंड वन विभाग, WWF-India तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के तकनीकी सुझावों के आधार पर तैयार की गई है।
एनएचएआई के अनुसार, वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए परियोजना में एक प्रमुख ब्रिज-कम-एलीफेंट अंडरपास, चार समर्पित एलीफेंट अंडरपास, लगभग 3.5 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड संरचना, छह बॉक्स कल्वर्ट तथा छोटे जीवों के लिए 13 पाइप कल्वर्ट बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा ग्रीन गाइड हेज, साउंड बैरियर, एंटी-ग्लेयर स्क्रीन, वन्यजीव चेतावनी संकेतक, स्पीड कैल्मिंग उपाय और 'नो हॉर्न' जोन जैसी व्यवस्थाएं भी परियोजना का हिस्सा हैं।
एनएचएआई ने बताया कि परियोजना से प्रभावित 4,369 पेड़ों में से 754 पेड़ों का प्रत्यारोपण फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) की वैज्ञानिक सिफारिशों के आधार पर किया जाएगा, जबकि शेष पेड़ों का नियमानुसार प्रबंधन होगा। प्रतिपूरक वनीकरण और अगले 10 वर्षों तक उसके रखरखाव के लिए 1.97 करोड़ रुपये जमा कराए गए हैं। साथ ही, 40 हेक्टेयर गैर-वन भूमि राज्य सरकार द्वारा वन विभाग को हस्तांतरित की गई है, जहां नए वन विकसित किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त वन्यजीव राहत योजना और मिट्टी एवं जल संरक्षण योजना के लिए 6.04 करोड़ रुपये से अधिक की राशि भी उपलब्ध कराई गई है।
सौरभ सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ समाचारों और सोशल मीडिया पोस्ट में यह दावा किया गया कि परियोजना के तहत उच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करते हुए पेड़ों की कटाई की जा रही है। उन्होंने इसे पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन बताते हुए कहा कि इस संबंध में दायर अवमानना याचिका को उच्च न्यायालय पहले ही खारिज कर चुका है। परियोजना का कार्य सभी आवश्यक वन एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियां प्राप्त करने के बाद ही शुरू किया गया है तथा न्यायालय और संबंधित प्राधिकरणों की सभी शर्तों का पालन किया जा रहा है।
वहीं, पर्यावरणविदों में इस परियोजना को लेकर चिंता बनी हुई है। पद्मश्री डॉ. अनिल जोशी सहित कई विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद आवश्यक है। उनका मानना है कि सड़क अवसंरचना का विकास जरूरी है, लेकिन जंगलों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
ऐसे में यह परियोजना अब केवल एक सड़क निर्माण योजना नहीं रह गई है, बल्कि उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस का प्रमुख विषय बन गई है।


