पिथौरागढ़। सोरघाटी की समृद्ध लोकसंस्कृति, आस्था और कृषि परंपरा की पहचान कुमौड़ की ऐतिहासिक हिलजात्रा सोमवार को श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रंगों के बीच संपन्न हो गई। हिलजात्रा के मुख्य आकर्षण लखिया बाबा के दर्शन और आशीर्वाद के लिए बड़ी संख्या में लोग मैदान में पहुंचे। ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक मुखौटों और लोक पात्रों के अभिनय ने पूरे वातावरण को लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया।
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वर्चुअल माध्यम से प्रतिभाग किया। मुख्य मंच पर दिदिहाट विधायक बिशन सिंह चुफाल, मेयर कल्पना चौहान, दीपिका बोहरा, वीरेंद्र बल्दिया, राज्यमंत्री गणेश भंडारी, वीरेंद्र बोहरा, भाजपा जिलाध्यक्ष गिरीश जोशी, पूर्व विधायक चंद्र प्रकाश पंत, जिलाधिकारी आशीष भटगाईं, पुलिस अधीक्षक अक्षय प्रह्लाद कोंडे सहित अनेक जनप्रतिनिधि, अधिकारी और गणमान्य लोग मौजूद रहे।
कुमौड़ की हिलजात्रा का इतिहास सदियों पुराना माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार कुमौड़ के चार महर भाई नेपाल में आयोजित होने वाली पारंपरिक इंद्रजात्रा में शामिल होने गए थे। उनकी वीरता से प्रभावित होकर नेपाल नरेश ने उन्हें यश और समृद्धि के प्रतीक मुखौटे प्रदान किए। इन्हीं मुखौटों को लेकर महर भाई कुमौड़ लौटे और नेपाल की इंद्रजात्रा की परंपरा से प्रेरित होकर यहां हिलजात्रा की शुरुआत हुई।
समय के साथ यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव न रहकर सोरघाटी की कृषि, लोककला, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत दस्तावेज बन गया। जिला प्रशासन की संस्कृति एवं विरासत संबंधी जानकारी भी हिलजात्रा को नेपाल से पिथौरागढ़ घाटी में आई कृषि एवं पशुपालक परंपरा से जोड़ती है।
हिलजात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण लखिया बाबा का आगमन माना जाता है। विशाल और विशिष्ट मुखौटे, पारंपरिक वेशभूषा और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच जब लखिया बाबा मैदान में पहुंचते हैं तो श्रद्धालुओं में उत्साह और आस्था का अद्भुत वातावरण बन जाता है।
स्थानीय मान्यताओं में लखिया को भगवान शिव के प्रिय गण के रूप में श्रद्धा से देखा जाता है और उनके आशीर्वाद को क्षेत्र की खुशहाली से जोड़ा जाता है।
हिलजात्रा की विशेषता इसका मुखौटा नाट्य और कृषि जीवन का जीवंत चित्रण है। बैल, हिरन-चीतल और अन्य पारंपरिक पात्रों के माध्यम से पहाड़ के खेत-खलिहान, पशुपालन और ग्रामीण जीवन को अभिनय के जरिए प्रस्तुत किया जाता है। यही कारण है कि हिलजात्रा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक लोकजीवन और परंपराओं को पहुंचाने का माध्यम भी है।
कुमौड़ की हिलजात्रा में लखिया बाबा के आगमन के साथ आयोजन अपने चरम पर पहुंचता है और श्रद्धालु उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए उमड़ पड़ते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी आधुनिक दौर में अपनी सांस्कृतिक जीवंतता बनाए हुए है।
हिलजात्रा के आयोजन में युवाओं की सक्रिय भागीदारी यह संदेश भी देती है कि लोक संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पहचान है। मुखौटों को तैयार करने से लेकर पात्रों के अभिनय और आयोजन की व्यवस्थाओं तक युवाओं की भागीदारी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
हिलजात्रा के सफल आयोजन के बाद हिलजात्रा महोत्सव समिति के अध्यक्ष गोपू महर ने आयोजन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि हिलजात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सोरघाटी की सदियों पुरानी लोकसंस्कृति, आस्था और सामाजिक एकता की पहचान है।
उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों, स्थानीय नागरिकों, कलाकारों, स्वयंसेवकों तथा दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं का विशेष रूप से धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि सभी के सामूहिक सहयोग से ही इस ऐतिहासिक परंपरा को भव्य स्वरूप दिया जा सका।
गोपू महर ने कहा कि लखिया बाबा के आशीर्वाद से हिलजात्रा का सफलतापूर्वक संपन्न होना पूरे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है। उन्होंने आने वाली पीढ़ी से भी अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संजोकर आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
कुमौड़ की धरती पर एक बार फिर ढोल की थाप, लोकनाट्य, मुखौटों और लखिया बाबा के आशीर्वाद ने सोरघाटी की सांस्कृतिक आत्मा को जीवंत कर दिया।
हिलजात्रा के संपन्न होने के साथ ही एक और वर्ष के लिए यह संदेश पीछे रह गया कि जिस समाज की जड़ें अपनी लोकपरंपराओं से जुड़ी रहती हैं, उसकी सांस्कृतिक पहचान कभी समाप्त नहीं होती ।


