पिथौरागढ़। देवभूमि के गढ़ पिथौरागढ़ के प्राकृतिक सौंदर्य से आलोकित लछेर क्षेत्र स्थित प्राचीन महाकाली मंदिर के नवीनीकरण का कार्य पूर्ण होने के बाद 24 अगस्त को विधि-विधान, मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच मां महाकाली की पुनः प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इस पावन अवसर पर भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

महाकाली और भगवती के साथ असुर बाबा के मंदिर में भी विशेष पूजा-अर्चना की गई। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में सैकड़ों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। सिरड़, खुना, नैनीपातल, दोलीचिराली, जुगापानी, मड़मानले सहित जिला मुख्यालय और जिले के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु एवं महिलाएं बड़ी संख्या में पहुंचीं। मंदिर परिसर मां के जयकारों से गूंज उठा।

स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि मां कालिका के प्रति अटूट आस्था और विश्वास का केंद्र है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां के दर्शन और आशीर्वाद से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

मंदिर के स्वरूप को भव्य बनाने का संकल्प श्री मयूख महर ने ‘तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा’ की भावना के साथ लिया। मंदिर समिति के पदाधिकारियों और क्षेत्रवासियों ने इस संकल्प को सामूहिक प्रयास में बदल दिया। परियोजना की सबसे खास बात यह रही कि बिना किसी सरकारी मदद के क्षेत्र के लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहयोग और श्रमदान देकर मंदिर के नवीनीकरण में योगदान दिया। जनता द्वारा मंदिर निर्माण के लिए भेंट भी दी गई।

यह सामूहिक भागीदारी देवभूमि की उस परंपरा को दर्शाती है, जहां धार्मिक आस्था केवल व्यक्तिगत विश्वास नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली शक्ति बन जाती है।

मंदिर में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान महिलाओं और श्रद्धालुओं की भागीदारी लगातार बनी रही। भव्य कलश यात्रा और प्राण-प्रतिष्ठा समारोह ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय वातावरण में सराबोर कर दिया।

देवभूमि पिथौरागढ़ की यही लोक आस्था, सामूहिक सहभागिता और अपनी परंपराओं के प्रति समर्पण उसे विशिष्ट पहचान देती है। शायद इसी जीवंत आस्था के कारण पिथौरागढ़ को ‘देवभूमि का गढ़’ कहा जाता है।

जय मां महाकाली। — कपिल भट्ट, वाणी न्यूज