पिथौरागढ़। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पारंपरिक विरासत के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे मेरो पहाड़ ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं पूर्व सैनिक मयूख भट्ट ने सातू-आठू (गमरा) पर्व को उसके मूल स्वरूप में गांवों से जोड़कर संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि सातू-आठू केवल मेला या मनोरंजन का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, देव आस्था, पारिवारिक रिश्तों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा है।

मयूख भट्ट ने कहा कि भाद्रपद मास की सप्तमी और अष्टमी को मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंध को दर्शाता है। स्थानीय वनस्पतियों से गमरा दीदी की आकृति तैयार कर उनकी पूजा की जाती है, जबकि महेश्वर भिना के माध्यम से भगवान शिव के प्रति आस्था व्यक्त की जाती है। यह परंपरा देवताओं के साथ आत्मीय रिश्तों और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव का संदेश देती है।

उन्होंने बताया कि मेरो पहाड़ ट्रस्ट पिछले कई वर्षों से सातू-आठू पर्व को गांव-गांव पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है। पलायन और बदलती जीवनशैली के कारण कमजोर होती इस परंपरा को बचाने के लिए ऑनलाइन प्रतियोगिता शुरू की गई, जिसमें पहले गांवों और बाद में मैदानी क्षेत्रों में बसे प्रवासी परिवारों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। एक गांव की परंपरा और प्रस्तुति को दूसरे गांवों ने अपनाया, जिसके परिणामस्वरूप आज 80 से अधिक गांवों और विभिन्न कॉलोनियों में सातू-आठू का आयोजन हो रहा है।

मूल पर्व के दिन गांवों में रहें लोग मयूख भट्ट ने जनपद स्तरीय सातू-आठू आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि जिला स्तर पर होने वाले कार्यक्रम संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन पर्व की वास्तविक आत्मा गांवों में बसती है।

उन्होंने चिंता जताई कि यदि सप्तमी-अष्टमी के मूल पर्व दिवस पर ही जिला मुख्यालय में बड़े आयोजन किए जाएंगे तो बड़ी संख्या में लोग गांवों के बजाय मुख्यालय पहुंचेंगे। इससे उन गांवों की परंपराएं प्रभावित होंगी, जहां बुजुर्ग आज भी अपने बच्चों और परिवारों के पर्व पर लौटने की प्रतीक्षा करते हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि जनपद स्तरीय आयोजन मूल पर्व के दिन गांवों में होने वाले पारंपरिक आयोजनों के बाद प्रतीकात्मक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया जाए। इससे लोग पहले अपने गांवों में सातू-आठू की मूल परंपराओं में शामिल हो सकेंगे और इसके बाद जिला स्तर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद ले सकेंगे।

गांवों में जीवित रहे संस्कृति की पहचान मयूख भट्ट ने कहा कि यदि सातू-आठू जैसे पारंपरिक पर्वों को केवल मुख्यालय के मंचों और मेलों तक सीमित कर दिया गया तो आने वाले समय में गांवों में इनकी परंपरा कमजोर पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि सातू-आठू को केवल मौज-मस्ती का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था, रिश्तों और सामूहिक ग्रामीण संस्कृति का पर्व बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि इस वर्ष और आने वाले वर्षों में सातू-आठू पर्व को अपने गांव, घर और परिवार के बीच पारंपरिक तरीके से मनाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति को केवल किताबों और मंचों पर नहीं, बल्कि अपने गांवों और परिवारों के बीच जीवंत रूप में देख सकें।