उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति में घृत संक्रांति, जिसे कुमाऊँ में घी संक्रांति या घी त्यार के नाम से जाना जाता है, का विशेष महत्व है। यह पर्व सूर्य के सिंह राशि में प्रवेश के अवसर पर मनाया जाता है और पहाड़ की पारंपरिक जीवनशैली, कृषि तथा पशुपालन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
घृत संक्रांति के दिन घी का सेवन करने की परंपरा है। पहाड़ों में इस दिन घर में बने घी को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता रही है कि घी शरीर को ताकत देता है और ऋतु परिवर्तन के दौरान स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना जाता है।
इस लोकपर्व से जुड़ी कई रोचक मान्यताएं भी हैं। कुमाऊँ में प्रचलित लोकविश्वास के अनुसार, इस दिन घी का सेवन न करने पर अगले जन्म में घोंघा बनने की बात कही जाती है। हालांकि यह धार्मिक आस्था और लोकमान्यता का हिस्सा है, लेकिन इस परंपरा के पीछे घी को पौष्टिक आहार मानने की ग्रामीण समझ भी दिखाई देती है।
घृत संक्रांति का संबंध केवल घी खाने से नहीं है। यह पर्व उस दौर में आता है जब पहाड़ों में बरसात का मौसम और खेती-किसानी का महत्वपूर्ण समय होता है। खेतों में फसलें लहलहा रही होती हैं और पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा होता है। ऐसे में दूध, दही और घी जैसे दुग्ध उत्पादों का महत्व और बढ़ जाता है।
इस अवसर पर घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। स्थानीय अनाज, दालों, सब्जियों और दुग्ध उत्पादों से तैयार भोजन परिवार के साथ मिलकर ग्रहण किया जाता है। गांवों में यह पर्व आज भी पारंपरिक खान-पान और सामाजिक मेलजोल की याद दिलाता है।
घृत संक्रांति दरअसल उत्तराखंड की उस लोकसंस्कृति की पहचान है, जिसमें त्योहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते, बल्कि प्रकृति, खेती, पशुपालन, भोजन और सामुदायिक जीवन से जुड़े होते हैं। आधुनिक जीवनशैली के बीच ऐसे लोकपर्व पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
_Kapil vaninews


