पिथौरागढ़। उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोकपर्व हरेला आज पूरे प्रदेश में श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, पर्यावरण संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से कुमाऊँ अंचल में हरेला का अत्यधिक महत्व है, जहां यह सावन मास के आगमन, नई फसल और खुशहाली का संदेश लेकर आता है।
हरेला से लगभग नौ दिन पहले घरों में गेहूं, जौ, धान, मक्का, सरसों सहित विभिन्न अनाजों के बीज मिट्टी में बोए जाते हैं। पर्व के दिन उगे हुए हरे अंकुरों को देवी-देवताओं को अर्पित करने के बाद परिवार के बड़े-बुजुर्ग इन्हें सभी सदस्यों के सिर और कानों पर रखकर सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान और जीवन में हरियाली के महत्व का संदेश देती है।
हरेला के अवसर पर प्रदेशभर में वृक्षारोपण अभियान, पर्यावरण जागरूकता रैलियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोकगीत और लोकनृत्य आयोजित किए जाते हैं। विद्यालयों, सरकारी विभागों, सामाजिक संगठनों तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जाता है। आज हरेला केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और हरित उत्तराखंड के निर्माण का जनआंदोलन बन चुका है।
लोक मान्यता है कि हरेला केवल अच्छी फसल और समृद्धि का पर्व नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध का उत्सव है। बदलते समय में यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य का संदेश भी देता है।
विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि सिर्फ पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है। हम हर वर्ष हरेला पर उत्साह के साथ पौधारोपण करते हैं, लेकिन हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह भी है कि अगले हरेला तक पिछले वर्ष लगाए गए पौधे सुरक्षित और जीवित रहें। यदि हम लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल करें, उन्हें पानी दें, पशुओं से बचाएं और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी निभाएं, तभी वृक्षारोपण अभियान वास्तव में सफल होगा और हरेला का उद्देश्य सार्थक होगा।
संदेश:
"हरेला हमें प्रकृति से प्रेम, पेड़ों के संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली बचाने का संदेश देता है। आइए, इस हरेला पर हम सभी कम से कम एक पौधा लगाने का संकल्प लें। साथ ही यह भी प्रण करें कि अगले हरेला तक उस पौधे की पूरी जिम्मेदारी निभाएंगे और उसे सुरक्षित रखेंगे। जब हर वर्ष लगाए गए पौधे जीवित रहेंगे और वृक्ष बनेंगे, तभी हरेला का वास्तविक उद्देश्य और हमारी पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी सार्थक होगी।" vaninews


