देहरादून। उत्तराखंड में मानसून के दौरान भारी बारिश और मौसम विभाग के रेड अथवा ऑरेंज अलर्ट के बीच स्कूलों को बंद करने के आदेश अब लगभग हर वर्ष की सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बन चुके हैं। वर्ष 2023 से 2026 तक कई जिलों में जिलाधिकारियों ने विद्यार्थियों की सुरक्षा को देखते हुए बार-बार विद्यालयों में अवकाश घोषित किया। हालांकि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन लगातार स्कूल बंद होने की स्थिति अब प्रदेश के शैक्षणिक ढांचे पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान एहतियाती कदम उठाना आवश्यक है, लेकिन यदि हर मानसून में स्कूल बंद करना ही एकमात्र विकल्प बन जाए तो यह विद्यालयों की आधारभूत संरचना, भवनों की मजबूती और आपदा प्रबंधन की तैयारियों की समीक्षा की मांग करता है।
प्रदेश के कई पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी ऐसे विद्यालय हैं, जहां भवन जर्जर हैं या स्कूल तक पहुंचने वाले मार्ग भूस्खलन और सड़क धंसने के कारण जोखिमपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में जिला प्रशासन को विद्यार्थियों की सुरक्षा के मद्देनजर अवकाश घोषित करना पड़ता है।
शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में कई विद्यालयों के निर्माण और मरम्मत के कार्य हुए हैं, लेकिन अनेक स्कूलों में अभी भी बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षित भवनों की आवश्यकता बनी हुई है। उनका मानना है कि यदि विद्यालयों को आपदा-रोधी बनाया जाए और पहुंच मार्गों को सुरक्षित किया जाए, तो बार-बार स्कूल बंद करने की आवश्यकता कम हो सकती है।
अभिभावकों का भी कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन लगातार छुट्टियों से पढ़ाई प्रभावित होती है। उनका मानना है कि सरकार को केवल आपातकालीन छुट्टियों पर निर्भर रहने के बजाय स्थायी समाधान पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या हर बारिश में स्कूल बंद करना ही समाधान है, या फिर प्रदेश के विद्यालयों को इतना सुरक्षित बनाया जाए कि बच्चे बिना डर के शिक्षा प्राप्त कर सकें? vaninews


