देहरादून । 38वें राष्ट्रीय खेल उत्तराखण्ड-2025 के दौरान उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति और पहचान को देशभर में प्रस्तुत करने में योगदान देने वाले पाण्डवाज़ ने अपने लंबित भुगतान को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। पाण्डवाज़ की ओर से जारी पत्र में दावा किया गया है कि दिसम्बर 2024 और जनवरी 2025 में किए गए कार्यों का भुगतान सितम्बर 2026 तक नहीं हुआ है। यदि यह दावा सही है, तो करीब 20 से 21 महीने से भुगतान लंबित रहने का मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

पाण्डवाज़ के मुख़्यमंत्री को लिखे खुले पत्र अनुसार उन्होंने 38वें राष्ट्रीय खेलों के लिए थीम सॉन्ग तैयार करने के साथ-साथ मशाल यात्रा के विभिन्न कार्यक्रमों में प्रस्तुति दी और उद्घाटन समारोह में भी हिस्सा लिया। उनका कहना है कि उन्होंने विभाग के अनुरोध पर अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई, लेकिन कार्य पूरा होने के लंबे समय बाद भी भुगतान के लिए उन्हें लगातार अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

पत्र में पाण्डवाज़ ने बताया है कि भुगतान के लिए सीएम हेल्पलाइन, खेल विभाग, खेल मंत्री, संबंधित अधिकारियों और मुख्यमंत्री आवास स्थित हेल्पडेस्क तक अपनी बात पहुंचाई गई। उनके मुताबिक पहली सीएम हेल्पलाइन शिकायत बिना समाधान के बंद कर दी गई, जबकि दोबारा शिकायत के बाद भी मामला लंबित है।

सबसे गंभीर सवाल उस दावे को लेकर उठता है जिसमें पाण्डवाज़ का कहना है कि उन्हें पहले बजट उपलब्ध नहीं होने की बात बताकर सहयोग करने को कहा गया था। उन्होंने परिस्थितियों को समझते हुए सहयोग किया, लेकिन अब उनके फोन तक नहीं उठाए जा रहे हैं और संदेशों का जवाब भी नहीं मिल रहा।

सरकार लगातार ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ जैसे अभियानों के माध्यम से आम जनता की समस्याओं को सुनने और उनका समाधान करने की बात करती है। ऐसे में पाण्डवाज़ का यह पत्र कई असहज सवाल खड़े करता है। अगर एक कलाकार समूह को अपने किए गए सरकारी कार्यक्रम के भुगतान के लिए करीब दो साल तक अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ें, तो आम आदमी की शिकायतों के निस्तारण की वास्तविक स्थिति क्या है?

क्या शिकायत दर्ज होना ही समाधान माना जाएगा, या शिकायतकर्ता को वास्तविक राहत मिलना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है?

जब सरकार जनता के बीच पहुंचकर उसकी समस्याएं सुनने का दावा करती है, तो फिर पाण्डवाज़ द्वारा पत्र में बताई गई लगातार अनदेखी और जवाब न मिलने की स्थिति कैसे बनी ? यदि अन्य कलाकारों और वेंडर्स का भुगतान किया जा चुका है, जैसा कि पाण्डवाज़ ने सवाल उठाया है, तो उनका भुगतान क्यों लंबित है? और यदि अन्य भुगतानों की स्थिति भी स्पष्ट नहीं है, तो विभाग को सार्वजनिक रूप से इसकी स्थिति बताने में क्या परेशानी है ?

यह मामला केवल एक भुगतान का नहीं, बल्कि सरकारी आयोजनों में काम करने वाले कलाकारों और स्थानीय प्रतिभाओं के प्रति प्रशासनिक जवाबदेही का भी सवाल है। जब किसी कलाकार या संस्था से सरकारी आयोजन के लिए समय, श्रम और प्रतिभा देने की अपेक्षा की जाती है, तो क्या कार्य पूरा होने के बाद समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए ?

पाण्डवाज़ ने मुख्यमंत्री से किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं की है। उनकी मांग है कि उनके द्वारा किए गए कार्य का भुगतान कराया जाए। ऐसे में अब निगाहें सरकार और संबंधित विभाग पर हैं कि क्या इस मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाएगी और लंबित भुगतान के लिए जिम्मेदारी तय होगी?

‘जनता के द्वार’ तक पहुंचने का दावा तभी सार्थक माना जाएगा, जब जनता की आवाज प्रशासन के दरवाजे पर पहुंचने के बाद भी अनसुनी न रहे। पाण्डवाज़ की यह गुहार अब सरकार के सामने इसी कसौटी पर एक सवाल बनकर खड़ी है। _कपिल भट्ट वाणी न्यूज़