चमोली। बद्रीनाथ धाम में आयोजित बताए जा रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर सामने आए दो सरकारी पत्र अब कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहे हैं। इन पत्रों को क्रम से पढ़ने पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कार्यक्रम की जानकारी प्रशासन को पहले से थी और उसकी तैयारियों को लेकर विभिन्न विभागों की बैठक तक बुलाई गई थी, तो आयोजन के बाद इसकी जिम्मेदारी और अनुमति को लेकर सवाल केवल गढ़वाल स्काउट के कमान अधिकारी से क्यों पूछा गया?

जिलाधिकारी कार्यालय के पहले पत्र में 19 और 20 सितंबर को बद्रीनाथ में देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव-2026 आयोजित किए जाने का उल्लेख है। पत्र में कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए विभिन्न विभागों के अधिकारियों को बैठक में बुलाया गया था। सूची में पुलिस, वन विभाग, स्वास्थ्य, लोक निर्माण, कृषि, उद्यान, सूचना, पर्यटन, परिवहन और ग्रामीण आजीविका मिशन के अधिकारियों के साथ प्रभारी अधिकारी, गढ़वाल स्काउट्स, ज्योतिर्मठ को भी शामिल किया गया था।

यानी दस्तावेज यह संकेत देता है कि कार्यक्रम प्रशासन की जानकारी से बाहर नहीं था। बल्कि उसके आयोजन को लेकर समन्वय और व्यवस्थाओं की समीक्षा की प्रक्रिया चल रही थी।

लेकिन दूसरे पत्र में तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। जिलाधिकारी ने गढ़वाल स्काउट के कमान अधिकारी को पत्र भेजकर बद्रीनाथ धाम में आयोजित वृहद कल्चरल फेस्टिवल को लेकर आपत्ति जताई। पत्र में मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से कार्यक्रम की जानकारी मिलने का उल्लेख करते हुए कहा गया कि कार्यक्रम में भीड़ जुटी और उच्च ध्वनि में साउंड का इस्तेमाल किया गया। साथ ही पूछा गया कि क्या आयोजन के लिए सक्षम स्तर से अनुमति ली गई थी और कार्यक्रम में उच्च ध्वनि वाले साउंड का प्रयोग किन कारणों से किया गया। भविष्य में इस प्रकार की पुनरावृत्ति न होने की बात भी कही गई है।

यहां सवाल यह नहीं है कि धार्मिक स्थल पर ध्वनि की मर्यादा और धार्मिक गतिविधियों की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए या नहीं । प्रशासन ने अपने पत्र में इसी चिंता को सामने रखा है। अगर कार्यक्रम प्रशासन की जानकारी में था, अधिकारियों की बैठक बुलाई गई थी और विभिन्न व्यवस्थाओं पर समीक्षा होनी थी, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि: कार्यक्रम की औपचारिक अनुमति किस स्तर से दी गई थी ? कार्यक्रम का अधिकृत आयोजन स्थल क्या था ? क्या स्वीकृत कार्यक्रम और वास्तविक आयोजन में कोई अंतर था ? साउंड सिस्टम के इस्तेमाल के लिए क्या कोई निर्धारित शर्त या सीमा तय की गई थी?

यदि शर्तों का उल्लंघन हुआ तो उसकी निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी ?

और सबसे महत्वपूर्ण—यदि प्रशासनिक स्तर पर कार्यक्रम की पूर्व जानकारी थी तो आयोजन के बाद जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया क्या थी ?

दो पत्रों के बीच यही सबसे बड़ा विरोधाभास एक तरफ प्रशासन का पत्र कार्यक्रम से पहले व्यवस्थाओं की समीक्षा और विभागीय समन्वय की बात करता है। दूसरी तरफ कार्यक्रम के बाद जारी पत्र में आयोजन की अनुमति और तेज ध्वनि के इस्तेमाल को लेकर आयोजक पक्ष से स्पष्टीकरण मांगा जाता है।

यह जरूरी नहीं कि दोनों पत्रों में विरोधाभास ही हो। संभव है कि कार्यक्रम की अनुमति या समन्वय एक स्तर पर हुआ हो, लेकिन आयोजन के दौरान स्वीकृत शर्तों से अलग गतिविधियां हुई हों। इसकी पुष्टि तभी होगी जब अनुमति पत्र, कार्यक्रम की स्वीकृत रूपरेखा और बैठक की कार्यवाही सार्वजनिक हो।

यदि प्रशासन पारदर्शिता के साथ यह स्पष्ट कर दे कि कार्यक्रम का प्रस्ताव किसने दिया, अनुमति किसने दी, आयोजन स्थल क्या स्वीकृत था, साउंड की अनुमति क्या थी और मौके पर निगरानी किस अधिकारी की थी, तो उठ रहे सवालों का जवाब स्वतः मिल सकता है।

क्योंकि जब किसी आयोजन की तैयारी के लिए प्रशासनिक स्तर पर पहले से बैठक हो, तो आयोजन के बाद केवल आयोजक से जवाब मांगने के बजाय पूरी प्रक्रिया और संबंधित जिम्मेदारियों का रिकॉर्ड सामने आना ही इस मामले को स्पष्ट कर सकता है।

_कपिल भट्ट वाणी न्यूज