क्या सिर्फ़ Gen Z दोषी है, या हम सब?

आजकल सोशल मीडिया पर Gen Z की भाषा, गाली-गलौज और अभद्र व्यवहार को लेकर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वालों की कमी नहीं है। हर कोई कह रहा है कि "आज की पीढ़ी बिगड़ गई है।"

लेकिन क्या हमने कभी यह सवाल पूछा कि आख़िर यह पीढ़ी ऐसा सीख कहाँ से रही है?

आज OTT प्लेटफ़ॉर्म, वेब सीरीज़, फ़िल्में और कई डिजिटल माध्यम ऐसी सामग्री से भरे पड़े हैं जहाँ गाली-गलौज, अश्लील संवाद और हिंसा को "रियलिस्टिक", "बोल्ड" या "एंटरटेनमेंट" के नाम पर परोसा जाता है। कई लोकप्रिय फ़िल्मों और वेब सीरीज़ में अपशब्दों की भरमार होती है, जिन्हें दर्शक हँसते हुए स्वीकार कर लेते हैं। जब बड़े कलाकार इन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो उसे "किरदार की मांग" या "यथार्थवाद" कहकर सराहा जाता है, लेकिन वही भाषा यदि किशोर या युवा बोल दें तो अचानक समाज की नैतिकता जाग उठती है।

प्रश्न यह नहीं है कि युवाओं की भाषा सही है या गलत। प्रश्न यह है कि क्या हम कारणों पर चर्चा कर रहे हैं, या केवल परिणामों की आलोचना कर रहे हैं?

बच्चे और किशोर वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते और सुनते हैं। यदि मनोरंजन उद्योग लगातार यह संदेश देगा कि गाली देना आधुनिकता, दबंगई या हास्य का हिस्सा है, तो उसका असर समाज पर पड़ना स्वाभाविक है। मनोविज्ञान भी बताता है कि बार-बार देखे और सुने जाने वाले व्यवहार सामान्य लगने लगते हैं।

विडंबना यह है कि जब ऐसी फ़िल्में या वेब सीरीज़ रिलीज़ होती हैं, तब समाज का बड़ा वर्ग उन्हें ट्रेंड कराता है, उनके संवाद सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं और करोड़ों रुपये का कारोबार होता है। लेकिन जब वही शब्द आम युवाओं की भाषा में दिखाई देते हैं, तब पूरा दोष केवल नई पीढ़ी पर डाल दिया जाता है।

यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने का प्रश्न नहीं है। बल्कि यह ज़िम्मेदारी का प्रश्न है। यदि फिल्मों और OTT सामग्री पर आयु-आधारित वर्गीकरण (Age Rating) है, तो उसका प्रभावी पालन क्यों नहीं होता? यदि अश्लीलता और अपशब्दों की भरमार वाली सामग्री आसानी से हर मोबाइल तक पहुँच रही है, तो केवल बच्चों को दोषी ठहराना कितना न्यायसंगत है?

समाज, परिवार, शिक्षा व्यवस्था, मनोरंजन उद्योग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म—सभी की साझा जिम्मेदारी है। केवल Gen Z को कठघरे में खड़ा कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

हमें यह तय करना होगा कि हम लक्षणों से लड़ेंगे या बीमारी के कारणों से।

क्योंकि अगर मनोरंजन के नाम पर अपशब्दों को सामान्य बनाया जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों की भाषा भी उसी दिशा में जाएगी। इसलिए बहस केवल युवाओं पर नहीं, बल्कि उस पूरे इकोसिस्टम पर होनी चाहिए जो उन्हें प्रभावित कर रहा है।

सवाल Gen Z का नहीं, सवाल उस समाज का है जो एक ओर अश्लील और अपशब्दों से भरी सामग्री को मनोरंजन मानकर स्वीकार करता है, और दूसरी ओर उसी का असर युवाओं में देखकर केवल उन्हें दोषी ठहराता है।