देहरादून, 29 अगस्त। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। हिमालयन वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलोत ने कहा है कि ग्लेशियर झीलें संभावित खतरे का कारण बन सकती हैं और इनकी नियमित निगरानी बेहद जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते प्रभावी निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित नहीं किए गए तो भविष्य में बड़ी आपदा का खतरा पैदा हो सकता है।

उत्तराखंड में 1,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाली करीब 426 ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं। इनमें कई झीलें भौगोलिक और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी परिस्थितियों के कारण संवेदनशील मानी जा रही हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की पहचान में 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है।

इन झीलों से संभावित खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार की ओर से नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के तहत उत्तराखंड के लिए करीब 30 करोड़ रुपये की परियोजना स्वीकृत की गई है। इसमें से लगभग 8.10 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। योजना के तहत संवेदनशील झीलों पर लगातार निगरानी के लिए सेंसर और अन्य आधुनिक उपकरण स्थापित किए जाने हैं, ताकि झील के जलस्तर या अन्य असामान्य गतिविधियों में बदलाव की समय रहते जानकारी मिल सके।

हालांकि, दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में उपकरण स्थापित करने और उन्हें लगातार संचालित रखने में कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आ रही हैं। कम्युनिकेशन नेटवर्क, सैटेलाइट कम्युनिकेशन की लागत, बिजली और बैटरी पावर तथा कठिन भौगोलिक परिस्थितियां प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं।

वसुंधरा ताल, माबांग, स्यूंतियांक्ति और प्युंगरु जैसी झीलों का अध्ययन किया जा चुका है। विशेषज्ञों के मुताबिक इन क्षेत्रों में केवल अध्ययन तक सीमित रहने के बजाय स्थायी निगरानी तंत्र और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना जरूरी है।

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी ग्लेशियर झील के अचानक टूटने या पानी के तेजी से बाहर निकलने की स्थिति में निचले इलाकों में अचानक बाढ़ आ सकती है। उत्तराखंड की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए विशेषज्ञ ऐसी झीलों की लगातार निगरानी और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में पहले से तैयारी को महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

डॉ. गहलोत के मुताबिक चुनौती केवल झीलों की पहचान करने की नहीं, बल्कि समय रहते खतरे का संकेत प्राप्त करने और उसे प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए भरोसेमंद सिस्टम तैयार करने की है। ऐसे में अर्ली वार्निंग सिस्टम को जल्द प्रभावी रूप से लागू करना आपदा जोखिम को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।