पिथौरागढ़। ज्ञान प्रकाश संस्कृत पुस्तकालय में मासिक विचार गोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। हिंदी दिवस एवं हिंदी पखवाड़े के उपलक्ष्य में आयोजित विचार गोष्ठी में हिंदी भाषा के इतिहास, उत्पत्ति, महत्व, संरक्षण और संवर्धन को लेकर वक्ताओं ने विचार रखे। वहीं काव्य गोष्ठी में कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी, मातृभाषा और सामाजिक सरोकारों को स्वर दिया।

गोष्ठी में डॉ. पीताम्बर अवस्थी ने कहा कि हिंदी के संरक्षण और उत्थान के लिए केवल हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़े तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे वर्ष प्रतिदिन इसके लिए समर्पित होकर कार्य करना जरूरी है।

डॉ. प्रमोद कुमार श्रोत्रिय ने हिंदी के इतिहास, महत्व और विभिन्न बोलियों पर प्रकाश डाला। डॉ. नीरज चंद्र जोशी ने कहा कि आजादी के बाद हिंदी को राजकाज, न्यायालय, विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान की भाषा बनाने के लिए पर्याप्त इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई। उन्होंने विद्यालयों में मातृभाषा में शिक्षण को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।

डॉ. आनंदी जोशी ने कहा कि हिंदी देश-विदेश में व्यापक रूप से बोली और समझी जाती है। उन्होंने कहा कि हिंदी में विपुल साहित्य रचा गया है, जिसका विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हो रहा है। अनीता जोशी ने दैनिक जीवन में मातृभाषा के अधिकाधिक प्रयोग पर जोर दिया।

उमा पाटनी अवनि ने कहा कि अपनी मातृभाषा बोलने में किसी प्रकार की झिझक नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे बोलने पर गर्व महसूस करना चाहिए। भावना भट्ट और काजल नेगी ने शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों को हिंदी बोलने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि जापान, रूस, जर्मनी और इजराइल जैसे देशों में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दी जाती है, तो भारत में भी इस दिशा में प्रयास होने चाहिए।

मंजुला अवस्थी ने हिंदी को राजकाज और न्यायालय की भाषा बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता बताई।

कविताओं से हिंदी और पहाड़ की संस्कृति को दिया स्वर काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता उमा पाटनी अवनि ने की, जबकि संचालन अनीता जोशी ने किया। इस दौरान डॉ. नीरज चंद्र जोशी, डॉ. पीताम्बर अवस्थी, डॉ. प्रमोद कुमार श्रोत्रिय, डॉ. आनंदी जोशी, अनीता जोशी, उमा पाटनी अवनि, भावना भट्ट और काजल नेगी ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

डॉ. नीरज चंद्र जोशी ने “खतरा है इस दौर में बुजदिलों से दिलेर को...”, डॉ. पीताम्बर अवस्थी ने “संस्कृत की लाड़ली चेलि छ हिंदी”, जबकि डॉ. प्रमोद कुमार श्रोत्रिय ने “हिंदी की पहचान को हम जानते हैं” जैसी रचनाएं प्रस्तुत कीं।

डॉ. आनंदी जोशी ने हिंदी के गुणों को रेखांकित करती कविता प्रस्तुत की। अनीता जोशी ने “रील बनूनी जनरेशन, ब्लॉग बनूनी जनरेशन” के माध्यम से समकालीन दौर को कविता में पिरोया। उमा पाटनी अवनि ने “मैं हिंदी हूं, मातृभाषा कहलाती हूं...” कविता सुनाई।

भावना भट्ट ने धन-दौलत की नश्वरता पर आधारित रचना प्रस्तुत की, जबकि काजल नेगी ने पहाड़ के प्राकृतिक जलस्रोत और गांव की स्मृतियों को “मेरे गांव का इकलौता धारा” जैसी पंक्तियों के माध्यम से जीवंत किया।

कार्यक्रम में मंजुला अवस्थी, सत्यवीर सिंह, कन्हैया लाल, जयश्री लोहनी, हेमा देवी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

रिपोर्ट: डॉ. नीरज जोशी