साहित्य
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चीज़ें कुछ नहीं बोलतीं, बोलते हैं शब्द
एक संवेदनशील कविता, जो बताती है कि वस्तुएँ मौन होती हैं, लेकिन उनके अर्थ, भावनाएँ और इतिहास शब्दों के माध्यम से जीवित होते हैं।
Vani Admin17 दिन पहले1 मिनट पढ़ें

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कुछ नहीं बोलती
बोलते हैं शब्द।
पेड़ से टूटा पत्ता,
शाख से गिरा फूल,
सूख चुकी नदी,
वीरान पड़े घर,
आदमी, जानवर, कीड़ों और पक्षियों की लाशें—
ये सब चीज़ें ही तो हैं।
चीज़ें
कुछ नहीं बोलती
बोलते हैं शब्द।
शब्दों को आदत है
सीना तानकर बोलने की,
पुराने को नए तरीके से बोलने की,
शब्दों को आदत है मुस्कुराने की,
शब्द चीज़ों के होंठों पर भाव रख देते हैं,
मुर्दों के जिस्मों में जान रख देते हैं,
पर नहीं रखते अपने जेहन में कभी भी
एक क्षणिक संवेदना,
क्योंकि शब्द ज़िंदा जिस्मों के
मुर्दा चीज़ों में तब्दील होने पर ही पैदा होते हैं।
(बूँद)
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