पिथौरागढ़। जनपद में जिलाधिकारी कार्यालय में आयोजित होने वाली जनसुनवाई में लगातार बढ़ रही लोगों की संख्या एक ओर प्रशासन के प्रति जनता के विश्वास को दर्शाती है, तो दूसरी ओर यह स्थानीय स्तर की सरकारी व्यवस्था पर कई महत्वपूर्ण सवाल भी खड़े करती है।

हर सप्ताह दूर-दराज़ के गांवों से लोग सड़क, पेयजल, बिजली, राजस्व, पेंशन, राशन कार्ड, भूमि विवाद, अतिक्रमण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं को लेकर सीधे जिलाधिकारी कार्यालय पहुंच रहे हैं। कई मामलों में त्वरित सुनवाई और अधिकारियों को मौके पर निर्देश मिलने से लोगों को राहत भी मिल रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जिलाधिकारी की पहल आम जनता में भरोसा पैदा कर रही है।

लेकिन प्रश्न यह भी है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिनके कारण लोगों को अपनी सामान्य समस्याओं के समाधान के लिए जिला मुख्यालय तक आना पड़ रहा है?

यदि ग्राम पंचायत, पटवारी, तहसील, विकासखंड और संबंधित विभाग समयबद्ध एवं संवेदनशील ढंग से कार्य करें, तो अधिकांश समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर ही हो सकता है। ऐसे में जिला मुख्यालय तक पहुंचने की मजबूरी कहीं न कहीं निचले स्तर की कार्यप्रणाली और जवाबदेही की कमी की ओर भी संकेत करती है।

जनसुनवाई व्यवस्था लोकतंत्र की एक मजबूत कड़ी है और इसका उद्देश्य आम नागरिक को सीधे प्रशासन से जोड़ना है। लेकिन यदि हर सप्ताह एक जैसी शिकायतें बार-बार सामने आती हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद खामियों का संकेत भी है।

प्रशासन के लिए यह आवश्यक है कि जनसुनवाई में प्राप्त शिकायतों का केवल निस्तारण ही न किया जाए, बल्कि उनका विश्लेषण कर यह भी देखा जाए कि कौन-से विभागों से सबसे अधिक शिकायतें आ रही हैं और उनके स्थायी समाधान के लिए क्या सुधार किए जा सकते हैं।

किसी भी जिले की अच्छी प्रशासनिक व्यवस्था का पैमाना केवल यह नहीं है कि जिलाधिकारी कितनी शिकायतें सुनते हैं, बल्कि यह भी है कि लोगों को जिलाधिकारी तक आने की आवश्यकता कितनी कम पड़ती है।

पिथौरागढ़ में यदि स्थानीय स्तर पर प्रशासन और विभाग अधिक जवाबदेह बनें, तो जनसुनवाई का स्वरूप शिकायत निवारण के साथ-साथ सुशासन के मॉडल के रूप में भी विकसित हो सकता है।