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साहित्य

जिधर देखो उधर नशा ही नशा

बेरोज़गारी, महंगाई, स्वार्थ, दिखावे और अंधविश्वास से लेकर समाजसेवा तक—जीवन में छाए अलग-अलग ‘नशों’ पर डॉ. तारा सिंह की सार्थक कविता

डा0 तारा सिंह , सामाजिक चिंतक ,लेखकबुधवार, 30 सितंबर 20261 मिनट पढ़ें
जिधर देखो उधर नशा ही नशा30/09/26Ad
युवा शक्ति में बेरोज़गारी का नशा किसी को अपनी सम्पत्ति का नशा जनता को बढ़ती मंहगाई का नशा मुनाफाखोरों को मिलावट का नशा नेताओं को भाषण लूटने का नशा पूंजीपतियों को काले धन का नशा नौकरशाही को सुविधाओं का नशा किसी को अपने ही स्वार्थों का नशा महिलाओं को अपने श्रृंगार का नशा किसी को खुशियां बांटने का‌ नशा बहुतों को नये नये फ़ैशन का‌ नशा किसी को स्वाध्याय का ही‌ नशा लोगों को ईर्ष्या द्वेश का भी नशा किसी को अपने सौन्दर्य का नशा कुछ को कविताएं लिखने का नशा बहुतों को इन्हें खूब सुनने का नशा किसी को पूजा पाठ में ही ‌नशा पाखंडियों को अंधविश्वास का सहारा किसी को समाज सेवा का नशा लोगों को नशीली चीजों का नशा जिधर देखो उधर नशा ही नशा लगता यही जीवन का असली मजा तारा सिंह को रक्त दान, नेत्र देहदान अंग दान की प्रेरणा देने का नशा। _डा0 तारा सिंह

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