साहित्य
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हिमालय के नाम अंतिम पत्र ।
जंगल की आग में सिर्फ पेड़ नहीं जलते—घोंसले, मधुमक्खियां, दुर्लभ जड़ी-बूटियां, मिट्टी के सूक्ष्म जीव और जलस्रोतों का भविष्य भी प्रभावित होता है; प्रकृति की हर क्षति को रुपयों में नहीं आंका जा सकता।
Vani Adminसोमवार, 31 अगस्त 20261 मिनट पढ़ें

Adप्रिय हिमालय,
हमने तुम्हें देवभूमि कहा।
तुम्हारे पर्वतों को प्रणाम किया।
तुम्हारी नदियों को माँ कहा।
तुम्हारे वृक्षों की पूजा की।
तुम्हारी जड़ी-बूटियों से उपचार खोजा।
तुम्हारी घाटियों में पर्यटन किया।
तुम्हारी तस्वीरें अपने घरों की दीवारों पर लगाईं।
लेकिन शायद तुम्हारी पीड़ा को उतना नहीं समझा जितना तुम्हारे सौंदर्य को देखा।
जब तुम्हारे जंगल जलते रहे, हमने कई बार उन्हें कई बार उन्हें गर्मियों की सामान्य घटना मान लिया।
धुआँ समाप्त हुआ तो हम भी भूल गए।
लेकिन तुम्हारे भीतर जीवन की जो छोटी-छोटी कड़ियाँ टूटती रहीं, उनका हिसाब किसने रखा?
उस घोंसले का हिसाब किसके पास है जिसमें चार अंडे थे?
उस मधुमक्खी के छत्ते की क्षति किस सरकारी तालिका में दर्ज हुई?
उस छोटी जड़ी-बूटी की कीमत किसने लगाई जो शायद किसी पहाड़ी ढलान की विशिष्ट पारिस्थितिकी का हिस्सा थी?
उस मिट्टी में रहने वाले करोड़ों सूक्ष्म जीवों की गणना किसने की?
और उस जलस्रोत की भविष्य की कमजोरी का मूल्यांकन कौन करेगा जिसकी जलधारण व्यवस्था आग से प्रभावित हुई?
शायद हर चीज की कीमत रुपये में तय नहीं हो सकती।
इसीलिए पर्यावरण संरक्षण अर्थशास्त्र से पहले नैतिकताओं का भी प्रश्न है।
डॉ किशोर कुमार पंत
संयोजक
वनाग्नि विहीन हिमालय,अभियान
अभिलाषा समिति, पिथौरागढ़,उत्तराखंड
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