देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के युवा विद्यार्थी मंथन कार्यक्रम में उस समय माहौल भावुक हो गया, जब एक स्कूली छात्रा ने खड़े होकर अपनी खेल उपलब्धि और उसके बाद सामने आई आर्थिक मजबूरी की कहानी सुनाई।
छात्रा ने बताया कि वह जम्मू में ताइक्वांडो की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलने गई थी, जहां उसने गोल्ड मेडल हासिल किया। उसकी उपलब्धि पर हॉल तालियों से गूंज उठा। लेकिन इसके बाद छात्रा ने जो कहा, उसने खुशी के उस माहौल को अचानक गंभीर चिंता में बदल दिया।
छात्रा के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने के बाद उसका चयन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ, लेकिन वहां जाने के लिए करीब डेढ़ लाख रुपये की व्यवस्था करनी थी। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि परिवार यह रकम जुटा सके। लिहाजा वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले पाई।
यह कहते-कहते छात्रा की आंखों में आंसू आ गए और कार्यक्रम स्थल पर कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
मुख्यमंत्री ने छात्रा को बैठने के लिए कहा और कार्यक्रम के संचालक से उसका स्कूल पूछकर मामले की जानकारी लेने के निर्देश दिए।
बाद में छात्रा ने वीडियो जारी कर स्थिति स्पष्ट की घटना के बाद छात्रा की ओर से जारी किए गए वीडियो में यह स्पष्ट किया गया कि मामला किसी से रिश्वत मांगे जाने का नहीं था। उसके अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए होने वाले खर्च की व्यवस्था उसे स्वयं करनी थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह डेढ़ लाख रुपये जुटा सके।
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का असली और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।
अगर किसी प्रतिभाशाली खिलाड़ी को सिर्फ इसलिए अंतरराष्ट्रीय मंच छोड़ना पड़े क्योंकि उसके परिवार के पास डेढ़ लाख रुपये नहीं हैं, तो क्या हमारी खेल व्यवस्था वास्तव में प्रतिभाओं को उनके मुकाम तक पहुंचा पा रही है?
मूल सवाल यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीत चुकी एक स्कूली खिलाड़ी जब अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए चयनित होती है, तो उसके यात्रा, प्रवेश, उपकरण, प्रशिक्षण और अन्य खर्चों की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए?
उत्तराखंड का खेल विभाग स्वयं अपनी वेबसाइट पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में विजेता खिलाड़ियों के प्रोत्साहन, प्रशिक्षण शिविरों, प्रतियोगिताओं से पहले विशेष प्रशिक्षण तथा टीमों के लिए किट व्यवस्था जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख करता है।
फिर भी यदि कोई खिलाड़ी आर्थिक कारणों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक नहीं पहुंच पाती, तो यह व्यवस्था की पहुंच, प्रक्रिया और समयबद्ध सहायता पर सवाल जरूर खड़ा करता है।
पहाड़ की प्रतिभाओं के लिए आर्थिक बाधा और बड़ी उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। दूरदराज के गांवों और छोटे कस्बों से निकलने वाले बच्चे सीमित संसाधनों के बावजूद जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचते हैं।
लेकिन प्रतिभा को पदक तक पहुंचाने के बाद अगली चुनौती शुरू होती है—यात्रा का खर्च, खेल सामग्री, कोचिंग, प्रतियोगिता शुल्क, आवास और अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी।
एक सामान्य या आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए डेढ़ लाख रुपये छोटी रकम नहीं है।
एक पिता अगर प्लंबर जैसे काम से परिवार का गुजर-बसर कर रहा हो, तो उसके सामने बेटी के सपने और घर की आर्थिक जरूरतों के बीच चुनाव की स्थिति पैदा हो सकती है।
और यही वह बिंदु है जहां सरकार की खेल नीति की असली परीक्षा होती है।
क्या होना चाहिए? ऐसे मामलों में केवल कार्यक्रम के मंच से “पता करवाओ” कह देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। जरूरत है कि राज्य में एक स्पष्ट और पारदर्शी खिलाड़ी सहायता तंत्र हो।
राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए चयनित होने वाले आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों की सूची तैयार हो। उनके लिए तत्काल वित्तीय सहायता की व्यवस्था हो। आवेदन, स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया इतनी तेज हो कि खिलाड़ी प्रतियोगिता की तारीख निकल जाने के बाद सहायता का इंतजार न करता रहे।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किस प्रतियोगिता के लिए खिलाड़ी को कौन-कौन से खर्च स्वयं उठाने हैं और सरकार, खेल विभाग या संबंधित खेल संघ से उसे कितनी सहायता मिल सकती है।
क्योंकि हर बच्चा आर्थिक रूप से मजबूत घर से नहीं आता इस बच्ची की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है।
यह उन तमाम बच्चों की कहानी हो सकती है जिनके पास प्रतिभा है, मेहनत है, पदक जीतने का हुनर है, लेकिन सपने को अगले पायदान तक ले जाने के लिए पैसा नहीं है।
सरकारें अक्सर खिलाड़ियों की सफलता पर मंच साझा करती हैं, पदक जीतने वालों को सम्मानित करती हैं और खेलों को बढ़ावा देने की बातें करती हैं।
लेकिन असली सवाल तब खड़ा होता है जब कोई खिलाड़ी जीतने के बाद कहता है— “मैं आगे खेल सकती थी, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं थे।”
उत्तराखंड अगर वास्तव में खेल प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना चाहता है, तो ऐसी आवाजों को सिर्फ एक कार्यक्रम की भावुक घटना मानकर भूलना नहीं होगा।
क्योंकि गोल्ड मेडल जीतने वाली बेटी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने से अगर सिर्फ डेढ़ लाख रुपये रोक दें, तो सवाल उस बेटी की प्रतिभा पर नहीं, हमारी व्यवस्था की पहुंच पर उठना चाहिए। कपिल भट्ट


