फिल्म ‘मंगल’ की समीक्षा: पहाड़ दिखा, लेकिन पहाड़ समझ नहीं आया स्कूली बच्चों को दिखाई जा रही फिल्म में उत्तराखंड के प्राकृतिक दृश्य तो हैं, लेकिन पहाड़ की जिंदगी, संघर्ष और पलायन का सच नदारद पिथौरागढ़। किसी फिल्म में पहाड़ दिखाना और पहाड़ को महसूस कराना—दो अलग बातें हैं। पहाड़ की पृष्ठभूमि में बनी फिल्म ‘मंगल’ को लेकर यही सवाल सबसे ज्यादा खड़ा होता है कि क्या यह वास्तव में पहाड़ की कहानी कह पाती है ?

फिल्म में उत्तराखंड के खूबसूरत पहाड़ी दृश्य जरूर दिखाई देते हैं। कैमरा पहाड़ों, रास्तों और प्राकृतिक सुंदरता को खूब कैद करता है, लेकिन इन दृश्यों के बीच पहाड़ का जीवन कहीं पीछे छूट जाता है। खासकर जब इस फिल्म को स्कूली बच्चों को दिखाया जा रहा हो, तब अपेक्षा और बढ़ जाती है कि मनोरंजन के साथ उन्हें अपने समाज, अपनी मिट्टी और अपनी परिस्थितियों को समझने का अवसर भी मिले।

उत्तराखंड का पहाड़ केवल सुंदर वादियां नहीं है। यह वह पहाड़ है जहां आज भी पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, सड़क, रोजगार और गांवों के खाली होते जाने जैसी गंभीर समस्याएं लोगों के जीवन का हिस्सा हैं।

अगर फिल्म का मुख्य किरदार ‘मंगल’ पहाड़ का लड़का है, तो उसके जीवन में इन सवालों की झलक क्यों नहीं दिखाई देती?

मंगल के संघर्ष को पहाड़ के संघर्ष से जोड़ने की गुंजाइश थी। उसकी कहानी के जरिए बच्चों को बताया जा सकता था कि पहाड़ से युवा आखिर क्यों बाहर जा रहे हैं, गांव क्यों खाली हो रहे हैं और अपने गांव लौटकर कुछ करने की संभावना क्या है।

लेकिन फिल्म इन सवालों को छूती हुई नजर नहीं आती। फिल्म के गीतों और उनके फिल्मांकन को लेकर भी एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। पहाड़ी परिवेश में फिल्माए गए गीतों में भी स्थानीय संस्कृति, लोकभाषा, लोकसंगीत, पारंपरिक जीवन और पहाड़ी संवेदनाओं की जगह बॉलीवुड शैली का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। गीत अगर पहाड़ में फिल्माया गया है, तो सिर्फ पीछे पहाड़ दिखा देने से वह पहाड़ी गीत नहीं बन जाता।

गीत में ढोल-दमाऊं, स्थानीय लोकधुन, बोली, परंपरा, पहनावा, सामाजिक जीवन और पहाड़ की अपनी लय दिखाई देती तो वह बच्चों और दर्शकों को पहाड़ से जोड़ सकता था। बच्चों के लिए फिल्म है तो सीख भी जरूरी सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि अगर फिल्म स्कूली बच्चों को दिखाई जा रही है तो वे फिल्म देखकर क्या सीख लेकर बाहर निकलेंगे ? मनोरंजन जरूरी है, लेकिन बच्चों के लिए बनाई या दिखाई जा रही फिल्म में कोई सकारात्मक संदेश, सामाजिक सरोकार या प्रेरणा भी होनी चाहिए।

‘मंगल’ के जरिए बच्चों को यह संदेश दिया जा सकता था कि पहाड़ छोड़कर जाना ही सफलता का रास्ता नहीं है। अपने गांव में रहकर भी रोजगार और अवसर पैदा किए जा सकते हैं। पलायन को रोकने में युवा क्या भूमिका निभा सकते हैं। पहाड़ की संस्कृति और भाषा को बचाना क्यों जरूरी है। शिक्षा का इस्तेमाल अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए कैसे किया जा सकता है।

लेकिन फिल्म देखने के बाद ऐसा कोई स्पष्ट और प्रभावशाली संदेश बच्चों के मन में कितना रह जाता है, यही फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी दिखाई देती है।

‘मंगल’ को देखते हुए लगता है कि पहाड़ फिल्म की कहानी का हिस्सा कम और फिल्म की लोकेशन ज्यादा है। अगर कहानी उत्तराखंड के किसी शहर या मैदान में रखी जाती और पीछे पहाड़ के दृश्य लगा दिए जाते, तो शायद कहानी में बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ता।

एक वास्तविक पहाड़ी फिल्म में पहाड़ केवल कैमरे के पीछे दिखाई देने वाला दृश्य नहीं होना चाहिए। पहाड़ किरदारों की भाषा में होना चाहिए, उनके संघर्ष में होना चाहिए, उनके फैसलों में होना चाहिए और उनकी कहानी में सांस लेना चाहिए।

उत्तराखंड में जब लगातार गांव खाली हो रहे हैं, युवा रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं और पहाड़ी संस्कृति अपनी पहचान बचाने के संघर्ष में है, तब पहाड़ पर बनने वाली फिल्मों से उम्मीद स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। क्या पहाड़ पर फिल्म बनाने का मतलब सिर्फ पहाड़ के सुंदर दृश्य दिखाना है ?

या फिर फिल्मकारों की भी जिम्मेदारी है कि वे पहाड़ के दर्द, संघर्ष, मजबूरी, पलायन और संभावनाओं को कहानी का हिस्सा बनाएं ?

‘मंगल’ इस कसौटी पर एक खूबसूरत दृश्यात्मक अनुभव तो देता है, लेकिन पहाड़ की आत्मा तक पहुंचने में कमजोर पड़ जाता है।

शायद अगली बार पहाड़ पर फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों को यह समझना होगा कि पहाड़ केवल कैमरे में कैद करने के लिए खूबसूरत जगह नहीं, बल्कि करोड़ों कहानियों, संघर्षों और सपनों की जीवित जमीन है।

— कपिल भट्ट | वाणी न्यूज