पिथौरागढ़ । समाज में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति के खिलाफ चलाए जा रहे डॉ. पीतांबर अवस्थी के नशामुक्ति अभियान को अब संत समाज का भी समर्थन मिलने लगा है। इसी क्रम में झंडू बाबा आश्रम, भैरव सुनाए, पीलीभीत के महंत घनश्याम गिरि जी महाराज ने अभियान से प्रभावित होकर इसमें सक्रिय सहयोग देने का विश्वास दिलाया है। उनका मानना है कि नशामुक्त समाज के निर्माण में संत-महात्माओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।

आज का युवा वर्ग तेजी से अध्यात्म और भक्ति की ओर आकर्षित हो रहा है, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में कई बार भक्ति और आस्था के नाम पर गलत आदतों की ओर भी बढ़ जाता है। भगवान भोलेनाथ के प्रति श्रद्धा रखने वाले कुछ युवा भक्ति के वास्तविक संदेश को समझने के बजाय नशे को जीवनशैली का हिस्सा बना लेते हैं। ऐसे में संत समाज यदि युवाओं को धर्म, अध्यात्म और सदाचार का सही अर्थ समझाए, तो नशे के खिलाफ एक सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन संभव है।

महंत घनश्याम गिरि जी महाराज का इस अभियान से जुड़ना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक कदम है। संत-महात्मा केवल धार्मिक उपदेश देने वाले नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा दिखाने वाले प्रेरणास्रोत भी होते हैं। उनके विचारों और मार्गदर्शन का युवाओं पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि मंदिरों, आश्रमों, धार्मिक आयोजनों और सत्संग के माध्यम से युवाओं को नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया जाए, तो नशे की गिरफ्त में जाने से पहले ही उन्हें सही रास्ते पर लाया जा सकता है।

नशा केवल एक व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को प्रभावित करता है। शराब, चरस, गांजा और अन्य मादक पदार्थों की लत व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है। इससे परिवारों में तनाव, आर्थिक संकट, घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं और अपराधों की आशंका बढ़ती है। कई बार युवा अपना भविष्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक प्रतिष्ठा तक नशे की भेंट चढ़ा देते हैं।

भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाता है, क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उन्होंने समुद्र मंथन से निकले विष को संसार और सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। उनका यह स्वरूप त्याग, संयम, लोककल्याण और करुणा का प्रतीक है। शिवभक्ति का अर्थ नशे को अपनाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करना और मानव कल्याण के मार्ग पर चलना है। भोलेनाथ ने विष संसार के कल्याण के लिए पिया था, न कि स्वयं के नशे के लिए।

यही संदेश आज के युवाओं तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को सदाचार, आत्मसंयम, सेवा और सकारात्मक जीवन की ओर प्रेरित करना है।

डॉ. पीतांबर अवस्थी का नशामुक्ति अभियान यदि संत समाज, सामाजिक संगठनों, शिक्षण संस्थानों और जागरूक नागरिकों के सामूहिक प्रयास से आगे बढ़ता है, तो यह केवल एक जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य बचाने का जनआंदोलन बन सकता है।

महंत घनश्याम गिरि जी महाराज का इस मुहिम के साथ खड़ा होना एक उम्मीद जगाता है कि धर्म और अध्यात्म की शक्ति का उपयोग समाज को नशे से मुक्त करने के लिए भी किया जा सकता है। आवश्यकता है कि संत समाज युवाओं को केवल भक्ति से जोड़ने तक सीमित न रहे, बल्कि उन्हें सही जीवन मूल्यों, आत्मसंयम और नशामुक्त जीवन की प्रेरणा भी दे।

क्योंकि सच्ची शिवभक्ति वही है, जो जीवन को बेहतर बनाए, परिवार को खुशहाल रखे और समाज के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे।