पिथौरागढ़। उत्तराखंड को सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार सुविधाओं से जोड़ने के सरकारी दावों के बीच पिथौरागढ़ जिले के धारचूला विकासखंड और बंगापानी तहसील का कनार गांव आज भी एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। सवाल यह है कि जब सरकार लगातार सीमांत और दुर्गम क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की बात करती है, तो कनार गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए क्यों तरस रहा है?

ग्रामीणों के मुताबिक गांव तक पहुंचने के लिए आज भी करीब 18 से 20 किलोमीटर की कठिन पहाड़ी पगडंडी तय करनी पड़ती है। सड़क का अभाव केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, राशन, आपातकालीन सेवाओं और ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है।

सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, सरकारी दावों का भी है सरकार की ओर से लगातार यह दावा किया जाता है कि दूरस्थ और सीमांत गांवों को सड़क संपर्क से जोड़ा जा रहा है। गांव-गांव तक विकास पहुंचाने और अंतिम छोर तक सुविधाएं उपलब्ध कराने की बातें भी होती हैं। लेकिन कनार की स्थिति इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है।

आखिर कनार तक विकास की नजर क्यों नहीं पहुंची?

क्या यह गांव प्रशासनिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं से बाहर है? क्या वर्षों से ग्रामीणों द्वारा उठाई जा रही मांगों को संबंधित विभागों और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचने के बावजूद उस पर गंभीरता से कार्रवाई नहीं हुई?

ग्रामीणों का दावा—कई बार उठा चुके हैं आवाज ग्रामीणों का कहना है कि कनार को सड़क से जोड़ने की मांग कोई नई नहीं है। ग्रामीण कई बार जिला मुख्यालय पहुंचकर धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं। सड़क की मांग को लेकर अपनी आवाज शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।

ग्रामीणों के मुताबिक स्थिति यहां तक पहुंच गई कि उन्होंने चुनाव बहिष्कार तक का फैसला लिया, ताकि उनकी समस्या पर सरकार और प्रशासन का ध्यान जाए। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि इसके बावजूद उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।

ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से सड़क की मांग कर रहे हैं, लेकिन आश्वासनों के अलावा उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ।

पगडंडी ही बनी जिंदगी की मजबूरी कनार के ग्रामीणों के लिए सड़क सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि जरूरत है। बीमार व्यक्ति को उपचार के लिए ले जाना हो, बच्चों को शिक्षा के लिए बाहर जाना हो, जरूरी सामान गांव तक पहुंचाना हो या किसी आपात स्थिति में मदद लेनी हो—हर परिस्थिति में दुर्गम पैदल रास्ता बड़ी चुनौती बन जाता है।

बारिश और खराब मौसम के दौरान यह परेशानी और भी बढ़ जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सीमांत गांव में रहने वाले नागरिकों को भी वही मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए, जिनका अधिकार देश के दूसरे हिस्सों के नागरिकों को है?

स्वास्थ्य और शिक्षा पर भी पड़ रहा असर सड़क के अभाव का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं पर दिखाई देता है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचना कठिन है। गंभीर बीमारी या आपातकाल की स्थिति में मरीज को लंबी दूरी तक पैदल ले जाना पड़ सकता है।

वहीं बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होती है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा के लिए बाहर जाने वाले बच्चों और उनके परिवारों के सामने अतिरिक्त चुनौतियां खड़ी होती हैं।

मोबाइल नेटवर्क भी बड़ी समस्या कनार में सड़क के साथ-साथ मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट कनेक्टिविटी भी ग्रामीणों की प्रमुख समस्याओं में शामिल है। डिजिटल दौर में जब सरकारी योजनाओं से लेकर शिक्षा, बैंकिंग और आपातकालीन सेवाओं तक बड़ी संख्या में काम मोबाइल और इंटरनेट पर निर्भर हैं, ऐसे में नेटवर्क का अभाव गांव को और अधिक अलग-थलग कर देता है।

क्या सीमांत गांव सिर्फ चुनाव के समय याद आते हैं?

कनार की स्थिति एक और गंभीर सवाल खड़ा करती है—क्या सीमांत गांवों की याद केवल चुनाव के समय आती है?

जब चुनाव के दौरान विकास और सुविधाओं के वादे किए जाते हैं, तो क्या उन वादों की निगरानी और समीक्षा भी होनी चाहिए? यदि ग्रामीण वर्षों से एक ही मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, तो उनकी समस्या के समाधान में इतनी देरी क्यों?

कनार के ग्रामीणों की पीड़ा केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम दूरस्थ गांवों की तस्वीर हो सकती है जो विकास की योजनाओं और सरकारी दावों के बीच कहीं पीछे छूट जाते हैं।

अब सरकार से जवाब की उम्मीद ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है—कनार को सड़क से जोड़ा जाए और स्वास्थ्य, शिक्षा तथा संचार जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

अब देखना यह है कि वर्षों से उठ रही इस आवाज पर शासन-प्रशासन कब गंभीरता से संज्ञान लेता है।

कनार का सवाल सिर्फ सड़क का सवाल नहीं है। यह सवाल है कि विकास की योजनाओं का लाभ आखिर अंतिम छोर तक कब पहुंचेगा?

और सबसे बड़ा सवाल— जब ग्रामीण कई बार जिला मुख्यालय तक अपनी आवाज पहुंचा चुके हैं, चुनाव बहिष्कार तक कर चुके हैं, तो आखिर उनकी आवाज जिम्मेदारों के कानों तक क्यों नहीं पहुंची?

_कपिल भट्ट वाणी न्यूज