विशेष रिपोर्ट | पिथौरागढ़ उत्तराखंड की पर्वतीय संस्कृति और लोककला में ऐसे कई अनमोल रत्न हुए हैं, जिनकी प्रतिभा किसी डिग्री या प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं रही। ऐसे ही एक विलक्षण शिल्पकार थे झीम राम, जिन्हें लोग आज भी सम्मानपूर्वक "अनपढ़ पहाड़ी इंजीनियर" के नाम से याद करते हैं।
डीडीहाट ब्लॉक के लखतीगांव निवासी रूप राम के पुत्र झीम राम का जन्म 1 मई 1913 को हुआ था। औपचारिक शिक्षा का अवसर उन्हें नहीं मिला, लेकिन प्रकृति और पारंपरिक निर्माण कला से सीखे ज्ञान ने उन्हें ऐसा हुनर दिया कि उन्होंने बिना सीमेंट और लोहे के केवल पत्थरों से ऐसे मेहराबदार (आर्च) पुल बनाए, जो आज भी मजबूती से लोगों की सेवा कर रहे हैं।
झीम राम ने पारंपरिक तकनीक और स्थानीय पत्थरों का उपयोग करते हुए ऐसे पुलों का निर्माण किया, जिन्हें देखकर आज भी इंजीनियरिंग कौशल पर आश्चर्य होता है। उनके द्वारा निर्मित अलायमल (द्योरिया) मंदिर के पास स्थित प्रसिद्ध पत्थर का मेहराबदार पुल उनकी उत्कृष्ट कारीगरी का सबसे चर्चित उदाहरण माना जाता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार झीम राम ने अपने जीवनकाल में चार प्रमुख मेहराबदार पुलों का निर्माण किया— 1954 – मस्मोली गाँव 1962 – द्योरिया (अलायमल) मंदिर के पास 1969 – रोल गाड़ पर 1970 – पाराकोट में इन पुलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें सीमेंट और लोहे का उपयोग नहीं किया गया, फिर भी ये कई दशकों से प्राकृतिक आपदाओं और मौसम की मार को झेलते हुए आज भी मजबूती से खड़े हैं।
झीम राम का जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा केवल पुस्तकों और डिग्रियों तक सीमित नहीं होती। उन्होंने अपने अनुभव, पारंपरिक ज्ञान और मेहनत के बल पर ऐसे निर्माण किए, जिन्हें आज भी ग्रामीण इंजीनियरिंग और लोक वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
दुर्भाग्यवश झीम राम अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके बनाए पुल आज भी उनकी अद्भुत प्रतिभा, दूरदर्शिता और मेहनत की अमिट पहचान बने हुए हैं।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि झीम राम जैसे लोक शिल्पकारों के योगदान का दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए। उनके बनाए पुलों को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों तक उनकी प्रेरणादायी कहानी पहुँचाई जानी चाहिए।
झीम राम केवल एक शिल्पकार नहीं थे, बल्कि उत्तराखंड की लोक प्रतिभा, आत्मनिर्भरता और पारंपरिक इंजीनियरिंग के जीवंत प्रतीक थे।


