हल्द्वानी। कुमाऊं की लोक संस्कृति, संगीत और कला को समर्पित हल्द्वानी में आयोजित कुमाऊं द्वार महोत्सव के सफल आयोजन के बीच अब सोशल मीडिया पर एक नई चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। चर्चा का विषय है उत्तराखंड के लोकप्रिय लोकगायक स्वर्गीय पप्पू कार्की के सुपुत्र दक्ष कार्की को महोत्सव में आमंत्रित न किया जाना।

महोत्सव में कुमाऊं के स्थापित कलाकारों के साथ-साथ कई युवा गायकों ने भी अपनी प्रस्तुतियां दीं। ऐसे में हल्द्वानी में ही रहने वाले दक्ष कार्की को मंच पर स्थान न मिलने को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे। कुछ लोगों ने इसे स्वर्गीय पप्पू कार्की की संगीत विरासत और उनके परिवार के प्रति उपेक्षा के रूप में भी देखा।

हालांकि, सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर सवाल उठाने वालों के बीच एक दूसरा पहलू भी चर्चा में है। लोकगायक स्वर्गीय प्रहलाद मेहरा के सुपुत्र कमल मेहरा भी कुमाऊं की संगीत परंपरा से जुड़े हैं, लेकिन उन्हें लेकर सोशल मीडिया पर वैसी चर्चा देखने को नहीं मिली। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कलाकारों के प्रति सम्मान और अवसर को लेकर चर्चा क्या समान रूप से होनी चाहिए?

इस पूरे मामले पर कुमाऊं द्वार महोत्सव के आयोजक गोविंद दिगारी का कहना है कि सोशल मीडिया पर जिस तरह की बातें प्रसारित की जा रही हैं, वास्तविकता वैसी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आयोजक दक्ष कार्की को भूले नहीं हैं और न ही उन्हें जानबूझकर नजरअंदाज किया गया है।

दिगारी के अनुसार, कुमाऊं द्वार महोत्सव और जौहर महोत्सव का आयोजन एक ही समय पर होने के कारण कलाकारों ने आपसी सहमति से अपनी प्रस्तुतियों को दोनों महोत्सवों में विभाजित करने का निर्णय लिया था। इसी व्यवस्था के तहत दक्ष कार्की के साथ गणेश मार्तोलिया, ललित मोहन जोशी और नीरज चुफाल सहित कुछ कलाकारों की प्रस्तुतियां जौहर महोत्सव में निर्धारित की गईं।

दरअसल, उत्तराखंड की लोक संस्कृति और संगीत की पहचान बनाने में पप्पू कार्की जैसे कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं। ऐसे में उनके सुपुत्र दक्ष कार्की को लेकर लोगों की भावनाएं जुड़ी होना स्वाभाविक है।

लेकिन किसी एक महोत्सव में प्रस्तुति न मिलना अपने आप में उपेक्षा या भेदभाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता। आयोजकों की ओर से दी गई सफाई के बाद इस विषय को पूरे संदर्भ में समझने की जरूरत है।

महोत्सवों का उद्देश्य कलाकारों को मंच देना और लोक संस्कृति को आगे बढ़ाना है। ऐसे आयोजनों को लेकर स्वस्थ चर्चा होनी चाहिए, लेकिन बिना पूरी जानकारी के किसी कलाकार या आयोजक के प्रति नकारात्मक धारणा बनाना उचित नहीं है। आखिरकार, कुमाऊं की लोक संस्कृति की असली ताकत कलाकारों के बीच सम्मान, सहयोग और आपसी सौहार्द में ही निहित है।