पिथौरागढ़। पहाड़ की लोकसंस्कृति में कुछ पल ऐसे होते हैं, जब मंच और दर्शक दीर्घा की दूरी मिट जाती है, अधिकारी और आमजन एक ही कतार में खड़े दिखाई देते हैं और लोक परंपरा सबको एक सूत्र में बांध देती है। पिथौरागढ़ के आठूं महोत्सव के समापन पर भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला।

गौरा-महेश्वर की विदाई के साथ आठूं महोत्सव का समापन हुआ, वहीं समापन समारोह की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई। तस्वीर में जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगांई स्थानीय कलाकारों के साथ हाथों में हाथ डालकर पारंपरिक झोड़ा लगाते दिखाई दे रहे हैं।

पीछे हजारों की संख्या में मौजूद दर्शक और सामने लोक कलाकारों की टोली के बीच जिलाधिकारी का कदम से कदम मिलाना पहाड़ की सांस्कृतिक परंपरा से प्रशासन के जुड़ाव की तस्वीर पेश करता है। आठूं महोत्सव के दौरान झोड़ा-चांचरी, पारंपरिक गीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने रामलीला मैदान को पूरी तरह लोक रंग में रंग दिया।

आठूं पर्व केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊं की गहरी लोकआस्था और पारिवारिक-सामाजिक भावनाओं से जुड़ा पर्व है। महोत्सव के समापन पर गौरा-महेश्वर को विधि-विधान और जयकारों के बीच विदाई दी गई। इस दौरान लोकगीतों और झोड़ा-चांचरी के बीच माहौल भावुक भी हुआ और श्रद्धा से भी भर उठा। गौरा-महेश्वर की विदाई के साथ ही कई दिनों से चल रहे सांस्कृतिक आयोजनों पर विराम लगा और आठूं महोत्सव संपन्न हुआ।

इसी समापन समारोह की तस्वीर में जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगांई को कलाकारों के साथ झोड़ा लगाते देख लोग इसे अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं।

एक नजरिया कहता है कि जब प्रशासन का मुखिया खुद लोक संस्कृति के बीच उतरकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाता है, तो यह स्थानीय परंपराओं के सम्मान का संदेश है।

झोड़ा सामूहिक लोकनृत्य है। इसमें लोग हाथ पकड़कर एक-दूसरे के साथ कदम मिलाते हैं। ऐसे में डीएम का कलाकारों के साथ शामिल होना किसी निजी मनोरंजन की बजाय सांस्कृतिक सहभागिता के रूप में देखा जा सकता है।

हालांकि यह तस्वीर ऐसे समय सामने आई है जब रामनगर के उपजिलाधिकारी गोपाल सिंह चौहान का सांस्कृतिक कार्यक्रम में नृत्य करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था।

रामनगर के सरस मेले में लोक कलाकारों की प्रस्तुति के दौरान एसडीएम मंच पर पहुंचे और गीत की धुन पर नृत्य किया। यहीं से दोनों घटनाओं को लेकर तुलना शुरू हो गई। लेकिन दोनों मामलों को केवल इस आधार पर एक जैसा मानना उचित नहीं होगा कि दोनों अधिकारी सांस्कृतिक कार्यक्रम में नृत्य करते दिखाई दिए।

किसी अधिकारी का लोक-सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होना अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता । यदि कोई अधिकारी सार्वजनिक लोकपर्व में स्थानीय संस्कृति को सम्मान देने और कलाकारों का उत्साह बढ़ाने के लिए कुछ समय झोड़े में शामिल होता है, तो इसे जनता से जुड़ने और लोकसंस्कृति को प्रोत्साहित करने की पहल के रूप में भी देखा जा सकता है।

पिथौरागढ़ के आठूं महोत्सव की यह तस्वीर इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें जिलाधिकारी अपने औपचारिक पद की छवि से अलग, पहाड़ की लोकसंस्कृति के बीच सहज नजर आते हैं। एक ओर प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी, दूसरी ओर अपनी ही धरती की लोकपरंपरा—दोनों के बीच संतुलन बनाना ही शायद ऐसे आयोजनों की असली भावना है।

आठूं महोत्सव समाप्त हो गया, गौरा-महेश्वर विदा हो गए, लेकिन समापन की यह तस्वीर एक सवाल छोड़ गई—क्या लोकसंस्कृति में अधिकारी की सहभागिता पद की मर्यादा के खिलाफ है, या फिर यही वह सहजता है जो प्रशासन और जनता के बीच की दूरी कम करती है ? __कपिल भट्ट वाणी न्यूज़