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साहित्य

तन्हाई की गहराई में डूब जाने वाली ग़ज़ल गोविंद भट्ट 'मुसाफिर' की अनमोल रचना

रिश्तों में घटते विश्वास और बढ़ती दूरियों का मार्मिक चित्रण।

Vani Admin55 दिन पहले1 मिनट पढ़ें
तन्हाई की गहराई में डूब जाने वाली ग़ज़ल गोविंद भट्ट 'मुसाफिर' की अनमोल रचना 15 AugastAd
तन्हा क्यों है? क़यामत सी भीड़ में, हर शख्स आज तन्हा क्यों है। माजरा वही है, हर आलम ज्यों का त्यों है॥ क़यामत सी भीड़ में...... जिस्म फ़रेब की दुनिया में, आज प्यार मज़ाक क्यों है। कभी इकरार तो, आज ऐतबार क्यों है॥ क़यामत सी भीड़ में...... ऐ ख़ामोशी में मुर्दा दिली , आखिर राज़ क्या है। इस बेदर्द आवाज़ का, आखिर साज़ क्या है॥ क़यामत सी भीड़ में आज...... लद रहे हैं दिन आज प्यार मोहब्बत के। कलम हुए जा रहे हैं दिल, आज मासूम इन्सा के॥ क़यामत सी भीड़ में...... इन्सावही, इंसानियत वही, आखिर यह माजरा क्यों है। क़यामत सी भीड़ में आज, हर शख्स तन्हा क्यों है॥ — गोविन्द भट्ट 'मुसाफ़िर' धारचूला रोड, पिथौरागढ़

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