साहित्य
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द्रोपदी की लाज
जब-जब समाज मौन हुआ, दुशासन और मजबूत हुआ।
Vani Admin30 दिन पहले1 मिनट पढ़ें

Adखतरे में है आज,
द्रोपदी की लाज।
सर्वत्र दुशासन है,
खींचने को तैयार।
साड़ी बीच सिमटी ,सिकुड़ी,
द्रोपदी की लाज।
खतरे में है आज,
आज एक नहीं।
द्रोपदी है अनेक
प्रत्येक की लाज।
खतरे में है आज।
पुकार रही व्यथित बना,
कृष्ण को।
कृष्ण भी मौन खड़ा आज,
खतरे में है द्रोपदी की लाज।
साड़ी नहीं उबटन भी,
खोलने को तैयार।
दुशासन है आज,
खतरे में है द्रोपदी आज।
कृष्ण उठो सुनो ,
द्रोपदी पुकार रही है आज।
बचाओ अबला की लाज
न्याय की आवाज है।
दयनीय आवाज है ,
संग नहीं साज है , उसे तुझपे नाज है !
तू क्यों नाराज है ?
ध्यान उसका भी कर ले आज , बचा ले द्रोपदी की लाज !!
--- गोविन्द भट्ट "मुसाफिर "
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