पिथौरागढ़। सरकार भले ही हर घर तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने और जनसमस्याओं के त्वरित समाधान के दावे करती हो, लेकिन ब्लाक कनालीछीना के ग्राम पंचायत बस्तडी की स्थिति इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि पेयजल की पाइपलाइन नाली के भीतर से गुजर रही है और पिछले करीब एक वर्ष से वे समस्या के समाधान के लिए विभागीय कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं।
समस्या को लेकर ग्राम प्रधान मंजू भट्ट ने 1 जनवरी 2026 को ‘जन-जन की सरकार, जनता के द्वार’ कार्यक्रम में जिलाधिकारी के समक्ष लिखित शिकायत भी रखी थी। शिकायत में नाली के भीतर से गुजर रही पेयजल लाइन को हटाकर सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने की मांग की गई थी।
शिकायत के बाद मामला जल निगम तक पहुंचा, लेकिन सितंबर 2026 तक भी पाइपलाइन को व्यवस्थित नहीं किया जा सका है। ग्रामीणों के अनुसार करीब 200 से 250 मीटर पाइपलाइन को नाली से हटाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाना है।
इस संबंध में जल निगम के EE पंचानन्द चौधरी से फोन पर वार्ता की गई। उनके अनुसार बजट की कमी के कारण कार्य नहीं हो पा रहा है। “बजट नहीं है”... लेकिन सवाल जनता की सेहत का है ,यही जवाब अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। यदि महज 200–250 मीटर पेयजल पाइपलाइन को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने के लिए भी बजट उपलब्ध नहीं है, तो जनता को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
नाली के भीतर से गुजर रही पाइपलाइन को लेकर ग्रामीणों ने पेयजल की स्वच्छता पर चिंता जताई है। हालांकि पानी के दूषित होने की पुष्टि के लिए जल गुणवत्ता की वैज्ञानिक जांच जरूरी है, लेकिन ऐसी स्थिति में पानी की गुणवत्ता की जांच और पाइपलाइन को सुरक्षित करने की कार्रवाई में देरी अपने आप में गंभीर प्रशासनिक प्रश्न खड़े करती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 1 जनवरी को जिलाधिकारी के सामने शिकायत पहुंचने के बाद संबंधित विभाग ने अब तक क्या कार्रवाई की ? क्या विभाग ने मौके का निरीक्षण किया ? क्या पाइपलाइन की जल गुणवत्ता की जांच कराई गई ? क्या पाइपलाइन शिफ्ट करने का आगणन तैयार हुआ ? यदि बजट नहीं है तो उच्च स्तर पर बजट की मांग कब भेजी गई ? जिलाधिकारी के निर्देश के बाद भी काम लंबित रहने की जिम्मेदारी किसकी है ? जब मामला ग्रामीणों के पेयजल और स्वास्थ्य से जुड़ा है तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई ?
‘जन-जन की सरकार, जनता के द्वार’ जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य ही यह है कि जनता की समस्याएं प्रशासन तक पहुंचें और उनका समाधान हो। लेकिन बसड़ी के ग्रामीणों का अनुभव यह सवाल खड़ा कर रहा है कि यदि शिकायत जिलाधिकारी के कार्यक्रम में देने के बाद भी महीनों तक समाधान नहीं होता, तो आम ग्रामीण अपनी समस्या लेकर आखिर किस दरवाजे पर जाए?
ग्रामीणों में इस देरी को लेकर नाराजगी है। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं और जनहित के दावों की असली परीक्षा जमीन पर होती है। यदि पेयजल जैसी बुनियादी आवश्यकता से जुड़ा छोटा-सा काम भी महीनों तक बजट के अभाव में अटका रहे, तो विभागीय कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मामले में जिला प्रशासन और जल निगम से अपेक्षा है कि मौके का तत्काल निरीक्षण कर पाइपलाइन की जल गुणवत्ता की जांच कराई जाए, पाइपलाइन को नाली से सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने की समयसीमा तय की जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि जनवरी में मिली शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई।
आखिर सवाल सिर्फ 200–250 मीटर पाइपलाइन का नहीं, बल्कि उस पानी का है जिसे ग्रामीणों को रोज पीना पड़ता है। देखना यह है कि अब कितने समय बाद निगम के पास बजट आपूर्ति होती है , और निगम नाली से पाइप कब हटाता है ?
_ कपिल भट्ट वाणी न्यूज़


