साहित्य
Ad
फूल, खुशबू और कविता का अनोखा संसार
विक्रम नेगी 'बूंद' की कविता में बाज़ार, संवेदना और जीवन के रस का गहन रूपक
Vani Adminरविवार, 19 जुलाई 20261 मिनट पढ़ें

Adगुलाब की पंखुड़ियों के खिलते ही
खिल उठती है कविता
भँवरे मंडराने लगते हैं आस-पास
खुशबू का कारोबार फलने लगता है
बाज़ार सजने लगते हैं
वाह...वाह...वाह...की आवाज़ महक उठती है
फूलों की खुशबू के साथ
फूलों के साथ-साथ
कविता भी बिक जाती हैं बाज़ार में.
खरीदार बहुत हैं.
फूल सूख गए,
कविता उदास हो गयी
भँवरे दूर-दूर तक कहीं नहीं हैं,
चलो अब मधुमक्खियों के पीछे उड़ा जाय,
उनके छत्तों से टपकते हुए
शहद का स्वाद चखा जाय
कविता सिर्फ़ सूंघने के लिए नहीं होती,
बल्कि चखने के लिए भी होती है
फूल-फूल हैं,
कविता-कविता है, शहद-शहद है,
और शाकाहारी लोगों के लिए
शहद
मधुमक्खी का मल नहीं होता,
बल्कि फूलों का रस होता है.
विक्रम नेगी "बूंद"
टिप्पणियाँ (0)
पहली टिप्पणी करें 👆
