टनकपुर /धारचूला।

पहाड़ों में सुरक्षित और सुगम आवाजाही के उद्देश्य से बनाई गई ऑल वेदर रोड एक बार फिर बरसात की चुनौती के सामने है। स्वाला डेंजर जोन में बारिश के बाद सड़क पर पैदा हुई नई परेशानी ने सड़क की सुरक्षा और डेंजर जोन के उपचार को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि स्वाला क्षेत्र में पहले ही करोड़ों रुपये की लागत से उपचार कार्य किए जा चुके हैं।

हालांकि पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश, भूस्खलन और भू-धंसाव जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि संवेदनशील स्थानों पर किए गए उपचार और सड़क सुरक्षा के उपाय इन परिस्थितियों में कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं।

स्वाला में यातायात सुचारु कर देना निश्चित रूप से राहत देता है, लेकिन इस मार्ग की पूरी समस्या यहीं खत्म नहीं होती। स्वाला से आगे घाट के पास मीना बाजार और मुन्ना बैंड तक सड़क के कई हिस्से बरसात में यात्रियों के लिए चुनौती बने हुए हैं।

इन क्षेत्रों में सड़क उपचार, जल निकासी और स्थायी सुरक्षा से जुड़े कार्यों की प्रभावशीलता को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यदि स्वाला में यातायात बहाल होने में कई घंटे लग जाते हैं तो यात्रियों को आगे घाट, मीना बाजार और मुन्ना बैंड तक पहुंचने में काफी समय लग जाता है।

स्वाला लंबे समय से संवेदनशील क्षेत्र रहा है। भूस्खलन और सड़क बाधित होने की घटनाओं को देखते हुए यहां डेंजर जोन के उपचार पर बड़ी धनराशि खर्च की गई। ऑल वेदर रोड परियोजना के दौरान सड़क चौड़ीकरण और सुरक्षा कार्यों से बेहतर और अधिक भरोसेमंद यातायात की उम्मीद जगी थी।

ऑल वेदर रोड परियोजना से सीमांत क्षेत्रों की कनेक्टिविटी में कई स्तरों पर सुधार हुआ है। सड़क चौड़ी होने से कई स्थानों पर यात्रा पहले की तुलना में सुविधाजनक हुई है। व्यापार, पर्यटन और सामरिक दृष्टि से भी बेहतर सड़क संपर्क का महत्व है।

लेकिन किसी भी सड़क परियोजना की सफलता केवल उसकी चौड़ाई, लागत या उद्घाटन से तय नहीं होती। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से भी होता है कि वह लंबे समय तक कठिन मौसम में कितनी सुरक्षित और भरोसेमंद बनी रहती है।

यही वजह है कि स्वाला सहित इस पूरे मार्ग की स्थिति को इसी व्यापक नजरिए से देखने की जरूरत है। यदि स्वाला में सड़क खोल भी दी जाती है, लेकिन आगे घाट, मीना बाजार और मुन्ना बैंड के संवेदनशील हिस्सों में बारिश के दौरान यात्रियों को लगातार जोखिम और अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है, तो आम आदमी के लिए सुचारु यातायात का अर्थ अधूरा रह जाता है।

यात्री के लिए सड़क तभी सुचारु मानी जाएगी, जब वह अपने गंतव्य तक अपेक्षाकृत सुरक्षित और समय पर पहुंच सके। इसलिए जरूरत स्वाला से आगे पूरे मार्ग का समग्र आकलन करने की है। सड़क की सतह के साथ-साथ पहाड़ी ढलान, जल निकासी, रिटेनिंग संरचनाओं, कटिंग और स्लोप की स्थिरता की नियमित निगरानी जरूरी है। जहां उपचार अधूरा है या अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं, वहां स्थायी समाधान तलाशना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

प्राकृतिक परिस्थितियों को नियंत्रित करना संभव नहीं, लेकिन जोखिम को कम करने के लिए तकनीकी तैयारी और नियमित निगरानी की जा सकती है। संवेदनशील क्षेत्रों में समय पर रखरखाव और स्थायी सुरक्षा उपाय यात्रियों की परेशानी को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

स्वाला की मौजूदा स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक सड़क बाधित होने की घटना नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था की परीक्षा है, जिसके तहत सीमांत क्षेत्र को हर मौसम में बेहतर कनेक्टिविटी देने का लक्ष्य रखा गया था।

अब सवाल यह है कि स्वाला से लेकर घाट–मीना बाजार–मुन्ना बैंड तक पूरा मार्ग कब ऐसा बनेगा, जिस पर बरसात के मौसम में भी आम यात्री बिना हर मोड़ पर सड़क बंद होने की आशंका के भरोसे के साथ सफर कर सके?

और दूसरा सवाल इससे भी बड़ा है—क्या करोड़ों रुपये खर्च कर डेंजर जोन का उपचार कर देना पर्याप्त है, या पहाड़ की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप इन क्षेत्रों की लगातार तकनीकी निगरानी और स्थायी उपचार भी उतना ही जरूरी है? कपिल भट्ट वाणी न्यूज