पिथौरागढ़। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में सदियों से मनाया जाने वाला खतड़ुवा पर्व पशुधन के प्रति पहाड़ के लोगों के स्नेह, सम्मान और उनकी सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा महत्वपूर्ण लोकपर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से कुमाऊं क्षेत्र में मनाया जाता है और इसके साथ पशुओं की सेवा, गोशाला की सफाई, पौष्टिक चारा खिलाने तथा लोकगीतों की परंपरा जुड़ी हुई है।
भादो मास के अंतिम दिन को कई स्थानों पर ‘गाय त्योहार’ के रूप में मनाने की परंपरा रही है। इस दिन गोशाला की विशेष सफाई कर उसमें हरी और नरम घास बिछाई जाती है। पशुओं को उपलब्ध अच्छे और पौष्टिक चारे के साथ पकवान आदि खिलाए जाते हैं। महिलाओं द्वारा पशुओं को घास खिलाते हुए लोकगीत गाने की भी परंपरा रही है।
गोशाला में छिल्लुक से किया जाता था उजाला ग्राम बसतड़ी के सेवानिवृत्त शिक्षक गोविंद बल्लभ भट्ट बताते हैं कि खतड़ुवा से एक दिन पहले गाय त्योहार मनाया जाता था। इस दिन गाय के गोठ में छिल्लुक से चारों कोनों में उजाला किया जाता था और पशुओं को उस समय उपलब्ध सबसे अच्छी घास खिलाई जाती थी।
उनके अनुसार, इसी दिन सूखे पेड़, झाड़ियों और घास-फूस को एक जगह एकत्र कर उसका टीले जैसा आकार बनाया जाता था, जिसे ‘खतड़वा’ कहा जाता था। अगले दिन आश्विन संक्रांति पर बुडि तैयार कर उसे गोधूलि बेला में खतड़वा में जलाया जाता था।
पशुओं के अच्छे स्वास्थ्य की कामना खतड़वा दहन के पीछे पशुओं के स्वस्थ रहने और उनसे जुड़े संकटों के दूर होने की लोकमान्यता है। आग जलाने के बाद लोग अपने-अपने पशुओं के प्रतीक के रूप में पत्थर रखते और उनकी पूजा करते थे। इसके बाद ककड़ी, सिरोला यानी भुना हुआ चावल, अखरोट आदि का सेवन किया जाता था।
कई क्षेत्रों में खतड़वा जलाते समय बच्चे और ग्रामीण पारंपरिक लोकउच्चारण करते हुए उत्सव मनाते थे। छिल्लुक से बनाई गई मशालों को लेकर गोशाला के आसपास घुमाने की परंपरा भी रही है।
कई गांवों में गोशाला के पास गोबर के ऊपर मोटी घास और फूलों से त्रिशूल जैसी आकृति बनाई जाती है, जिसे ‘बुडी’ कहा जाता है। इसी प्रकार की आकृति घर की छत पर भी बनाने की परंपरा रही है। शाम को खतड़वा दहन के दौरान बुडी को भी आग में समर्पित किया जाता था।
लोकमान्यता में इस पूरी प्रक्रिया को पुराने दुख, दरिद्रता और संकट को दूर कर सुख-समृद्धि तथा पशुधन के स्वस्थ जीवन की कामना से जोड़ा जाता है।
कुमाऊं के धारचूला और मुनस्यारी के शौका जनजातीय क्षेत्रों में भी खतड़ुवा उत्साह के साथ मनाए जाने की परंपरा है। यहां स्थानीय युवक जंगल या किसी ऊंचे टीलेनुमा स्थान पर लकड़ियां और सूखी घास एकत्र करते हैं। ‘पुल्या’ नामक घास से दो पुतले बनाए जाते हैं, जिन्हें प्रतीकात्मक रूप से बूढ़ा और बूढ़िया का रूप दिया जाता है।
शाम के समय चीड़ के छिलकों से बनी मशालों के साथ युवक और बच्चे वहां पहुंचते हैं। घास-फूस तथा बूढ़ा-बूढ़िया के पुतलों को जलाकर उनके चारों ओर नाच-गाकर पर्व मनाया जाता है। आग बुझने के बाद उसकी राख घर ले जाकर परिवार के सदस्यों और पशुओं के माथे पर लगाने की परंपरा भी बताई जाती है।
खतड़ुवा केवल धार्मिक या लोक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि पहाड़ के पारंपरिक जीवन और मौसम के बदलाव से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद मौसम में बदलाव शुरू होता है और पशुओं में मौसमी बीमारियों की आशंका बढ़ सकती है। ऐसे समय में पशुओं की सफाई, बेहतर चारा और देखभाल पर जोर देना पर्व के व्यावहारिक पक्ष को भी दर्शाता है।
आश्विन माह से पहाड़ों में ठंड की शुरुआत मानी जाती है। इसलिए इस समय लोग गर्म कपड़े, बिस्तर और अन्य जरूरी सामान धूप में सुखाकर शीतकाल की तैयारी भी शुरू करते थे।
आज आधुनिक जीवनशैली के कारण खतड़ुवा पर्व मनाने के पारंपरिक तौर-तरीकों में कई जगह बदलाव आया है, लेकिन कुमाऊं के अनेक गांवों में यह पर्व आज भी लोकस्मृति और सांस्कृतिक पहचान के रूप में जीवित है। पशुधन को परिवार का हिस्सा मानने वाली पहाड़ी जीवनशैली और प्रकृति के साथ सामंजस्य की भावना इस पर्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में शामिल है।
गोविंद बल्लभ भट्ट के अनुसार, पहले खतड़ुवा केवल एक उत्सव नहीं था, बल्कि पूरे गांव के लिए पशुओं की सेवा, उनकी पूजा और उनके अच्छे स्वास्थ्य की सामूहिक कामना का अवसर हुआ करता था । _कपिल भट्ट


