पिथौरागढ़। सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं समाजसेवी डॉ. पीतांबर अवस्थी ने साहित्य, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। साहित्य को समाज से जोड़ने, नई पीढ़ी में अध्ययन की रुचि विकसित करने तथा लोकभाषा और लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए उनके प्रयासों का उल्लेख किया जाता रहा है। उनके नाम से जुड़ा 51 हजार पुस्तकों के निःशुल्क वितरण का कीर्तिमान पुस्तक संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के उनके प्रयासों का प्रमुख उल्लेखनीय पक्ष है।
डॉ. अवस्थी साहित्य को केवल पढ़ने-लिखने तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक चेतना और जनजागरण का माध्यम बनाने की दिशा में कार्य करते रहे हैं। पिथौरागढ़ में ज्ञान प्रकाश संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना को उनके साहित्यिक योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पुस्तकालय और साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से अध्ययन, ज्ञान-विस्तार तथा भारतीय भाषाओं और परंपराओं के प्रति रुचि विकसित करने का प्रयास किया गया है।
डॉ. पीतांबर अवस्थी के सामाजिक और साहित्यिक योगदान में 51 हजार पुस्तकों के निःशुल्क वितरण का कीर्तिमान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पुस्तकों को निःशुल्क उपलब्ध कराने की ऐसी पहल विद्यार्थियों, युवाओं और सामान्य पाठकों तक ज्ञान पहुंचाने के उद्देश्य को रेखांकित करती है। यह प्रयास पुस्तक संस्कृति को प्रोत्साहित करने और समाज में पढ़ने की परंपरा को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
डॉ. अवस्थी के सामाजिक कार्यों में बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने तथा समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए जागरूकता फैलाने से जुड़े प्रयासों का भी उल्लेख मिलता है। ‘चेलि बचा, चेलि पढ़ा’ जैसे संदेशों के माध्यम से बेटियों की शिक्षा और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता का महत्व सामने आता है। ‘हरूली आमा छात्रवृत्ति’ का संदर्भ भी बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने वाली पहल के रूप में जुड़ा है।
युवाओं को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना आज समाज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। डॉ. पीतांबर अवस्थी को लेकर पिथौरागढ़ जिला अस्पताल में नशामुक्ति अभियान के अंतर्गत युवाओं को जानकारी देने वाली गतिविधियों का उल्लेख भी सामने आया है। नशे से होने वाले शारीरिक, पारिवारिक और सामाजिक नुकसान के प्रति जागरूकता फैलाना तथा युवाओं को सकारात्मक दिशा में प्रेरित करना इस प्रकार के अभियानों का प्रमुख उद्देश्य है।
उत्तराखंड की लोकभाषाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना क्षेत्र की पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण कार्य है। डॉ. अवस्थी की साहित्यिक गतिविधियों में हिंदी, संस्कृत और कुमाऊँनी साहित्य के प्रचार-प्रसार तथा स्थानीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता को भी स्थान मिलता है। लोकसाहित्य और परंपराओं का दस्तावेजीकरण भावी पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में सहायक हो सकता है।
डॉ. अवस्थी से जुड़ी साहित्यिक कृतियों में सामाजिक सरोकारों, शिक्षा, पर्यावरण और जनजागरण जैसे विषयों का उल्लेख मिलता है। उनके नाम से संदर्भित पुस्तकों में ‘परछाई’, ‘पंचप्रिया’, ‘जिंदगी जरूरी है’, ‘बेटियां’, ‘अभियान एक दस्तावेज’, ‘हिमालय’, ‘उत्तराखंड के परंपरागत जलस्रोत’, ‘रोगनाशी जड़ी-बूटियां’ और ‘नशे पर प्रहार’ जैसी कृतियां शामिल बताई गई हैं। इन शीर्षकों से साहित्य के विविध सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों से जुड़ाव दिखाई देता है।
डॉ. पीतांबर अवस्थी के संबंध में उपलब्ध पूर्ववर्ती सामग्री में शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक सम्मान, उत्तराखंड रत्न मानद उपाधि और कुसुम जगमोरा लोक साहित्य सम्मान–2025 जैसे सम्मानों का उल्लेख मिलता है। लोकभाषा, लोककला और लोकसंस्कृति के संरक्षण से जुड़े सम्मान का संदर्भ भी सामने आया है।
डॉ. पीतांबर अवस्थी की साहित्यिक और सामाजिक गतिविधियां इस विचार को सामने रखती हैं कि पुस्तकों के माध्यम से ज्ञान का प्रसार, शिक्षा के प्रति जागरूकता और स्थानीय संस्कृति का संरक्षण समाज के दीर्घकालिक विकास के महत्वपूर्ण आधार हैं। 51 हजार पुस्तकों के निःशुल्क वितरण से जुड़ा कीर्तिमान उनकी पहचान का प्रमुख हिस्सा है, जो पुस्तक संस्कृति और ज्ञान-वितरण के महत्व को रेखांकित करता है।


