लोहाघाट। देवभूमि उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था के संगम स्थल झूमाधुरी में नंदाष्टमी महोत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। समुद्र तल से करीब 2400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित झूमाधुरी नंदा देवी मंदिर में आयोजित चार दिवसीय महोत्सव के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

नंदाष्टमी के अवसर पर पाटन-पाटनी और रायकोट कुंवर गांव से मां नंदा और महाकाली की भव्य रथ यात्राएं निकाली गईं। शुक्रवार रात दोनों गांवों में देवी जागरण हुआ। शनिवार दोपहर बाद पहले पाटन-पाटनी और फिर रायकोट कुंवर गांव से रथ यात्रा मंदिर के लिए रवाना हुई। हाथों में चंवर लिए श्रद्धालु देवी के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़े।

मंदिर की तलहटी में स्थित प्राचीन छोटे मंदिर में दोनों रथों को कुछ देर रोका गया, जहां देवी-देवताओं को भोग अर्पित किया गया। इसके बाद करीब दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई शुरू हुई। श्रद्धालुओं ने रस्सों के सहारे रथों को खींचते हुए जयकारों के बीच मुख्य मंदिर तक पहुंचाया।

दोनों रथों के मंदिर परिसर में पहुंचते ही पूरा क्षेत्र मां नंदा और महाकाली के जयकारों से गूंज उठा। मंदिर की परिक्रमा करते दोनों रथों का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। समिति के अध्यक्ष मोहन चंद्र पाटनी के अनुसार करीब 20 हजार श्रद्धालु डोला-रथ यात्रा के साक्षी बने। सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए पुलिस की ओर से व्यापक इंतजाम किए गए थे।

आस्था के साथ प्राकृतिक सौंदर्य भी आकर्षण झूमाधुरी मंदिर धार्मिक आस्था के साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है। मौसम साफ होने पर यहां से नंदा देवी, त्रिशूल और पंचाचूली जैसी हिमालयी चोटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। इसके अलावा पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों की ऊंची पहाड़ियों का नजारा भी यहां से देखा जा सकता है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार कभी इस क्षेत्र में गुप्त गंगा का झरना बहता था, जो समय के साथ लुप्त हो गया। इसकी निशानी के रूप में आज भी यहां एक नौला मौजूद है। मंदिर से जुड़े अनेक लोकविश्वास और कथाएं आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।

मेले में दिखी लोक संस्कृति और बाजार की रौनक नंदाष्टमी मेले में धार्मिक आयोजनों के साथ व्यापारिक गतिविधियां भी देखने को मिलीं। मैदानी क्षेत्रों से पहुंचे व्यापारियों ने विभिन्न प्रकार की दुकानें सजाईं। सुहावने मौसम और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण पूरे मेले में उत्साह और रौनक बनी रही।

मान्यता है कि झूमाधुरी में मां नंदा की आराधना करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और निसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है। करीब एक शताब्दी से यहां नंदाष्टमी मेले के आयोजन की परंपरा चली आ रही है, जबकि पिछले डेढ़ दशक से चार दिवसीय झूमाधुरी नंदाष्टमी महोत्सव का भव्य आयोजन किया जा रहा है।

धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और हिमालयी प्राकृतिक सौंदर्य के अनूठे संगम के साथ झूमाधुरी नंदाष्टमी महोत्सव का समापन हुआ।

साभार: जिला चंपावत पेज