पिथौरागढ़। पहाड़ में भांग का नाम सुनते ही यदि सिर्फ नशे की तस्वीर सामने आती है तो शायद पहाड़ की उस परंपरा को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिसमें भांग के बीज सदियों से रसोई का हिस्सा रहे हैं। कुमाऊं और गढ़वाल के घरों में भुने हुए भांग के बीजों से तैयार होने वाली चटनी आज भी पारंपरिक भोजन का अहम हिस्सा है। अल्मोड़ा जिला प्रशासन की वेबसाइट भी भांग की चटनी को उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों में शामिल करती है।

लेकिन अब खेतों में भांग की फसल को लेकर होने वाली कार्रवाई ने ग्रामीणों के सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—अगर खेत में भांग का पौधा ही नहीं रहेगा तो आने वाली पीढ़ी की पारंपरिक भांग की चटनी के लिए बीज कहां से आएगा?

ग्रामीणों का कहना है कि उनके लिए भांग का मतलब सिर्फ नशा नहीं है। इसके बीजों को भूनकर चटनी बनाई जाती है और इसे पहाड़ी भोजन के साथ खाया जाता है। यही वजह है कि ग्रामीण भांग की अवैध नशीली खेती और पारंपरिक खाद्य उपयोग के लिए भांग के बीज को एक ही नजर से देखने के बजाय दोनों के बीच स्पष्ट अंतर किए जाने की मांग कर रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि नशे के लिए होने वाली अवैध खेती पर कार्रवाई का वे विरोध नहीं करते। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर भांग का पौधा नशे के लिए ही उगाया जाता है ? पहाड़ की पारंपरिक रसोई में इस्तेमाल होने वाली भांग की चटनी भांग के बीजों से बनाई जाती है। इसे उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन का हिस्सा माना जाता है। वर्ष 2025 में प्रकाशित ICAR की सामग्री में भी भांगजी के बीज को मसाले और चटनी में इस्तेमाल होने वाला पारंपरिक खाद्य बताया गया है तथा इसे पर्वतीय क्षेत्रों के पारंपरिक आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन खेतों से पौधों को लगातार नष्ट करता है तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि पारंपरिक खाद्य उपयोग के लिए कानूनी और सुरक्षित तरीके से भांग के बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था क्या है।

NDPS कानून में कैनाबिस पौधे की खेती पर प्रतिबंध है, लेकिन कानून की धारा 14 सरकार को औद्योगिक उद्देश्यों के लिए निर्धारित शर्तों के तहत खेती की अनुमति देने का प्रावधान देती है। उत्तराखंड आबकारी विभाग में इसके लिए अलग ‘भांग अनुभाग’ भी मौजूद है, जो औद्योगिक भांग से संबंधित कार्य देखता है।

ऐसे में ग्रामीणों का सवाल है कि जब औद्योगिक उपयोग के लिए नियंत्रित व्यवस्था बनाई जा सकती है तो पारंपरिक खाद्य संस्कृति से जुड़े भांग के बीज की उपलब्धता के लिए भी स्पष्ट सरकारी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती ?

क्या पारंपरिक खाद्य उपयोग में आने वाले भांग के बीज को वैध तरीके से ग्रामीणों तक पहुंचाने की व्यवस्था है ? क्या लाइसेंस प्राप्त औद्योगिक हेम्प की खेती से प्राप्त बीजों को खाद्य उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है ? पुलिस और प्रशासन के स्तर पर अवैध नशीली खेती तथा पारंपरिक खाद्य उपयोग के बीच क्या स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं ?

अगर पारंपरिक भांग की खेती पूरी तरह बंद करनी है तो ग्रामीणों को भांग की चटनी के लिए वैध बीज कहां से मिलेंगे ? क्या नशे के खिलाफ कार्रवाई करते हुए पहाड़ की सदियों पुरानी खाद्य संस्कृति को भी बचाने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है ?

ग्रामीणों की मांग है कि सरकार इस पूरे मामले पर स्पष्ट नीति और जनजागरूकता जारी करे। उनका कहना है कि नशे के खिलाफ अभियान जरूरी है, लेकिन उसी अभियान की आड़ में पारंपरिक खाद्य संस्कृति खत्म नहीं होनी चाहिए।

भांग की चटनी आज उत्तराखंड की पहचान बन चुकी है और इसे लेकर 2026 में भी राष्ट्रीय स्तर पर व्यंजन के रूप में सामग्री प्रकाशित हुई है।

अब सवाल सिर्फ खेत में उगने वाले पौधे का नहीं है। सवाल यह है कि जिस भांग के बीज ने पहाड़ की रसोई को पीढ़ियों तक स्वाद दिया, क्या आने वाली पीढ़ियां भी उसी स्वाद को चख पाएंगी ? _ कपिल भट्ट वाणी न्यूज