उत्तरकाशी। उत्तरकाशी जिले के सीमांत भटवाड़ी ब्लॉक का रैथल गांव इन दिनों अपनी सदियों पुरानी लोक परंपरा भेड़ मेले को लेकर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। रैथल समेत आसपास के पांच गांवों में मनाया जाने वाला यह पारंपरिक आयोजन केवल मेला नहीं, बल्कि पहाड़ के लोगों और उनके पशुधन के बीच सदियों पुराने रिश्ते का जीवंत प्रतीक है।
बुग्यालों में गर्मियों के दौरान भेड़-बकरियों को चराने के बाद जब पशुपालक उन्हें वापस गांव लेकर लौटते हैं, तो इस वापसी को विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के रूप में मनाया जाता है। पशुधन को स्थानीय देवता के मंदिर तक लाया जाता है और परंपरा के अनुसार उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
मेले की प्रमुख परंपराओं में भेड़-बकरियों को देवस्थान के चारों ओर घुमाना और उनकी पूजा करना शामिल है। ग्रामीण देवी-देवताओं से अपने पशुधन की सुरक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और गांव की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
पशुपालकों के लिए यह परंपरा महज धार्मिक आस्था नहीं है। पहाड़ में भेड़-बकरियां लंबे समय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। इसलिए पशुधन की सुरक्षित वापसी को उत्सव के रूप में मनाने की यह परंपरा आज भी लोगों की भावनाओं से जुड़ी हुई है।
मेले के दौरान भेड़ों से ऊन निकालने की पारंपरिक प्रक्रिया भी की जाती है। यह आयोजन नई पीढ़ी को उस पारंपरिक पशुपालन संस्कृति से परिचित कराता है, जिसमें ऊन ग्रामीणों की आजीविका और पहाड़ी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
मेले में आसपास के गांवों से देवी-देवताओं की डोलियां भी गाजे-बाजे के साथ पहुंचती हैं। मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक पूजा के बीच पूरा वातावरण लोक आस्था से सराबोर हो जाता है।
इसके बाद ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में थड़िया, झुमैलो और रासो जैसे लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं। ढोल-दमाऊं और लोकगीतों के बीच ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी मेले को खास सांस्कृतिक पहचान देती है।
उत्तराखंड के अलग-अलग पर्वतीय क्षेत्रों में पशुधन से जुड़े मेलों की अपनी-अपनी परंपराएं हैं। कुछ क्षेत्रों में भेड़ों को सामूहिक रूप से नमक खिलाने और उनकी पूजा करने की परंपरा भी देखने को मिलती है। मान्यता है कि इससे पशुधन स्वस्थ रहता है।
बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के बीच रैथल का भेड़ मेला पहाड़ की लोक संस्कृति को जीवित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। बुजुर्ग जहां इस परंपरा की पुरानी स्मृतियों और मान्यताओं को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं युवा पीढ़ी भी उत्साह के साथ इसमें शामिल हो रही है।
रैथल का भेड़ मेला इस बात की याद दिलाता है कि पहाड़ में प्रकृति केवल जीवन का आधार नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था का भी हिस्सा है। बुग्यालों से लौटता पशुधन, देवता के मंदिर की परिक्रमा, ऊन की कटाई, देव डोलियां और लोकनृत्य—ये सभी मिलकर पहाड़ की उस जीवनशैली की तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें इंसान, पशु और प्रकृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। - vaninews


