झूलाघाट। नेपाल सीमा से लगे मूनाकोट ब्लॉक का च्यौड़ी गांव आजादी के 80 वर्षों बाद भी मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहा है। हैरानी की बात यह है कि ग्रामीण वर्ष 2022 से लगातार शासन-प्रशासन को गांव की नेटवर्क समस्या से अवगत करा रहे हैं, लेकिन चार साल बीत जाने के बाद भी समस्या के समाधान की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर च्यौड़ी गांव के ग्रामीणों की जिंदगी में मोबाइल नेटवर्क आज भी किसी सुविधा से ज्यादा ‘पहाड़ी पर जाकर मिलने वाला सिग्नल’ बनकर रह गया है। अपनों से बात करनी हो, गैस बुक करनी हो या कोई जरूरी ऑनलाइन काम करना हो—ग्रामीणों को करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर नेटवर्क वाले क्षेत्र तक पहुंचना पड़ता है।
स्थानीय निवासी ओमी भट्ट बताते हैं कि गांव के आसपास दूर-दूर तक कोई मोबाइल टावर नहीं है। वड्डा और लेलू क्षेत्र से उड़कर आने वाले कमजोर सिग्नल ही ग्रामीणों का एकमात्र सहारा हैं। गांव में सिग्नल की स्थिति ऐसी है कि मोबाइल हाथ में होने के बावजूद बात करने के लिए जगह तलाशनी पड़ती है।
सबसे दिलचस्प और सवाल खड़ा करने वाली बात यह है कि च्यौड़ी में नेपाल का मोबाइल नेटवर्क आसानी से पहुंच रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि नेपाल के मोबाइल सिग्नल काफी मजबूत हैं और दूर तक आते हैं, जबकि भारतीय नेटवर्क अपने ही देश के सीमावर्ती गांवों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
ऐसे में ग्रामीणों के मन में सवाल उठना लाजिमी है—सीमा के उस पार नेपाल का नेटवर्क इतनी दूर तक पहुंच सकता है तो भारत का नेटवर्क अपने ही सुदूरवर्ती गांव तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा? क्या यह भारतीय नेटवर्क तकनीक की कमजोरी है, भौगोलिक चुनौती है या फिर सरकारी सिस्टम की उदासीनता?
नेटवर्क की कमी का सबसे ज्यादा असर गांव के विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं पर पड़ रहा है। आज शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन माध्यम पर निर्भर है, लेकिन च्यौड़ी के युवाओं को इंटरनेट चलाने के लिए भी गांव से बाहर निकलना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने स्थानीय विधायक, सांसद और जिला प्रशासन को कई बार समस्या से अवगत कराया है। हर बार सर्वे कराने और समस्या का समाधान करने का भरोसा दिया जाता है, लेकिन चार साल बाद भी ग्रामीणों को यह पता नहीं चल पाया कि आखिर वह दिन कब आएगा, जब गांव में मोबाइल टावर खड़ा होगा।
ग्रामीणों के मुताबिक हर चुनाव में मोबाइल नेटवर्क गांव का प्रमुख चुनावी मुद्दा बन जाता है। चुनाव के दौरान नेता आते हैं, समस्या सुनते हैं और समाधान का आश्वासन देते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही नेटवर्क का मुद्दा भी जैसे ‘ठंडे बस्ते’ में चला जाता है।
वर्ष 2020 में सड़क सुविधा से जुड़ने के बाद ग्रामीणों को उम्मीद थी कि अब गांव विकास की अगली सीढ़ी पर पहुंचेगा। लेकिन सड़क के बाद भी मोबाइल नेटवर्क का इंतजार जारी है।
चार साल से शासन-प्रशासन को अपनी समस्या बता रही च्यौड़ी की जनता अब सिर्फ एक जवाब चाहती है — क्या गांव में मोबाइल टावर लगाने के लिए भी ग्रामीणों को अगले चुनाव तक इंतजार करना पड़ेगा ? और अगर नेपाल का नेटवर्क सीमा पार से च्यौड़ी तक पहुंच सकता है, तो भारत का नेटवर्क अपने ही गांव तक पहुंचने में आखिर इतना वक्त क्यों ले रहा है ?
_ वाणी न्यूज


