सोमेश्वर।
देश ने खुले में शौच से मुक्ति और स्वच्छता को लेकर लंबी यात्रा तय करने का दावा किया है। स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य केवल शौचालयों का निर्माण करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता और नागरिकों को सम्मानजनक सुविधा उपलब्ध कराना भी है। उत्तराखंड सरकार की स्वच्छ भारत मिशन संबंधी जानकारी में भी सार्वजनिक स्थलों की स्वच्छता और सार्वजनिक शौचालयों को मिशन के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल किया गया है।
लेकिन अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर बाजार से सामने आया एक मामला इन दावों के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक युवती की आपबीती के अनुसार, बाजार में उसकी सहेली को अचानक माहवारी शुरू हो गई। तत्काल वॉशरूम की जरूरत पड़ी तो दोनों पास के एक रेस्टोरेंट पहुंचीं और शौचालय इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी। आरोप है कि उन्हें वहां शौचालय इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी गई और सार्वजनिक शौचालय जाने को कहा गया।
इसके बाद जो सामने आया, वह इससे भी ज्यादा गंभीर था।
युवतियां सार्वजनिक शौचालय पहुंचीं तो उसकी हालत उपयोग के लायक नहीं बताई गई। एक रिपोर्ट में शौचालय के दरवाजे तक नहीं होने की बात सामने आई है। यानी जिस सुविधा की जरूरत एक महिला को अपनी निजता और गरिमा के साथ थी, वहां मूलभूत सुविधा ही सवालों के घेरे में आ गई।
सवाल सिर्फ एक लड़की का नहीं ,यह घटना केवल एक युवती की परेशानी मानकर खत्म नहीं की जा सकती। सोमेश्वर बाजार में रोजमर्रा के काम, खरीदारी, इलाज और अन्य जरूरतों के लिए आसपास के क्षेत्रों से महिलाएं आती हैं। ऐसे में सवाल है कि अगर किसी महिला को अचानक माहवारी हो जाए या उसे तत्काल शौचालय की जरूरत पड़े, तो वह कहां जाएगी?
महिलाओं के लिए शौचालय केवल एक सुविधा नहीं है। यह निजता, स्वच्छता, स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़ा बुनियादी सवाल है। केंद्र सरकार की एक हालिया आधिकारिक सामग्री में भी स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण को महिलाओं की निजता और गरिमा में वृद्धि से जोड़ा गया है।
दूसरा सवाल उस रेस्टोरेंट को लेकर है जहां युवतियों ने आपात स्थिति में वॉशरूम इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी। यहां कानूनी स्थिति को समझना जरूरी है। हर रेस्टोरेंट में मौजूद शौचालय को हर राहगीर के लिए खोलना अनिवार्य है, ऐसा सामान्य नियम सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता। लेकिन खाद्य प्रतिष्ठानों को खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता संबंधी निर्धारित मानकों का पालन करना होता है। FSSAI के अनुसार लाइसेंस प्राप्त खाद्य कारोबारियों को Schedule-4 के स्वच्छता मानकों और Food Safety Management System का पालन करना होता है।
इसलिए प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि स्थानीय भवन/व्यापार लाइसेंस, नगरपालिका अथवा पंचायत के नियमों के तहत संबंधित प्रतिष्ठान पर शौचालय सुविधा को लेकर क्या दायित्व लागू होते हैं।
शौचालय बन जाना ही स्वच्छ भारत मिशन की सफलता नहीं है। दरवाजा नहीं, पानी नहीं, सफाई नहीं और सुरक्षा नहीं—तो ऐसा शौचालय आखिर किस काम का?
उत्तराखंड के स्वच्छ भारत मिशन के आधिकारिक विवरण में सार्वजनिक शौचालयों को स्वच्छता व्यवस्था का हिस्सा माना गया है।
सोमेश्वर के मामले में अब प्रशासन की ओर से नया हाईटेक सार्वजनिक शौचालय बनाने की प्रक्रिया की बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार जिला पंचायत स्तर पर भूमि चयन और निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही गई है।
नया शौचालय कब बनेगा?
कौन उसका रखरखाव करेगा?
उसकी सफाई कौन सुनिश्चित करेगा?
महिलाओं की सुरक्षा और निजता की जिम्मेदारी किसकी होगी?
और तब तक बाजार में आने वाली महिलाओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या है?
स्वच्छ भारत मिशन ने देश में शौचालय और स्वच्छता को लेकर बड़ा बदलाव किया है। लेकिन इस बदलाव की असली परीक्षा आंकड़ों में नहीं, जमीन पर इस्तेमाल योग्य सुविधाओं में होती है।
सोमेश्वर की यह घटना प्रशासन के लिए चेतावनी है कि शौचालय सिर्फ निर्माण की योजना नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली सार्वजनिक सेवा है।
महिला को शौचालय के लिए भटकना न पड़े, माहवारी के दौरान उसे शर्मिंदगी न उठानी पड़े और किसी सार्वजनिक बाजार में उसे अपनी बुनियादी जरूरत के लिए असुरक्षित या अपमानजनक परिस्थिति का सामना न करना पड़े—यही स्वच्छता का वास्तविक अर्थ है।
सवाल आखिर यही है—अगर शौचालय बना है, लेकिन जरूरत के वक्त महिला उसका इस्तेमाल ही नहीं कर सकती, तो फिर ‘स्वच्छ भारत’ का दावा जमीन पर कितना सच है?
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